गुजरात प्रदेश के सूरत महानगरपालिका के सेंट्रल जोन (लिंबायत) में भाजपा के सीधे आशीर्वाद से बेखौफ भ्रष्टाचार करने वाले कार्यपालक इंजीनियर विपुल गणेशवाला को हाल ही में एसीबी ट्रैप में गिरफ्तार किया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने एसीबी की कार्यप्रणाली की वर्षों से चली आ रही प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
(१ )दिनांक 19/02/2026 की रात विपुल गणेश वाला के साथी आरोपी को एसीबी ट्रैप किया और एसीबी टीम की मौजूदगी में वह व्यक्ति मोपेड पर बैठकर शांतिपूर्वक ₹4 लाख लेकर रवाना हो गया।
(२) उसी दिन अर्थात 19/02/2026 को एसीबी में एक एफआईआर दर्ज होने के बावजूद, आरोपी नंबर 1 विपुल गणेशवाला को एसीबी किस कारण रात के समय उसके घर से हिरासत में नहीं ले सकी?
विपुल गणेशवाला पुरुष अधिकारी हैं और एसीबी उन्हें महिला अधिकारी समझ रही थी क्या, जो रात में उनके घर जांच के लिए नहीं गई?
( ३) दिनांक 20/02/2026 की सुबह रोज़ाना की तरह विपुल गणेशवाला ज़ोन कार्यालय में हाजिर होकर रूटीन कामकाज करने लगे और इसके बाद सुबह 11:30 बजे वे सीधे एसीबी कार्यालय पहुंचकर आत्मसमर्पण कर दिया।
फिर भी एसीबी द्वारा इसे सफल ट्रैप बताया जाना कुछ हद तक हास्यास्पद प्रतीत होता है।
(४) दिनांक 29/02/2026 को आशीर्वाद देने वाले आकाओं की स्क्रिप्ट के अनुसार, बिना मोबाइल लिए ट्रैप शूटिंग पूरी होने के बाद विपुल गणेशवाला सीधे एसीबी कार्यालय पहुंचकर सरेंडर हो गए।
( ५) दिनांक 28/2/2026 को रेंज विपुल गणेशवाला के एसीबी कार्यालय में पहने हुए ट्रैक सूट को बदलकर नया ट्रैक सूट पहनते हुए और उसके चेहरे पर मुस्कान के साथ वीडियो बनाए जाने के बाद एसीबी ने उन्हें माननीय कोर्ट के सामने पेश कर रिमांड की मांग की।
जिसमें मुख्य मुद्दा था कि गणेशवाला का मोबाइल जब्त करना, पूछताछ के दौरान क्या हुआ और किस केस में फँसाने के दौरान कितना भ्रष्टाचार हुआ, इसकी विस्तार से जानकारी प्राप्त करना।
(६) माननीय कोर्ट ने एसीबी की मांग स्वीकार करते हुए दो दिनों का रिमांड मंजूर किया।
( ७) दिनांक 2/3/2026 को एसीबी ने दोपहर 3:00 बजे गणेशवाला को माननीय कोर्ट के सामने पेश किया और जब कोर्ट ने उन्हें जेल कस्टडी में भेजने का आदेश दिया, तब ऐसा लगा कि एसीबी गणेशवाला के दो दिन के रिमांड में दर्ज सभी कबूलातों को छिपाने के लिए ही मोबाइल जब्त करने में सफल रही।
तो फिर माननीय कोर्ट के सामने और रिमांड की मांग क्यों नहीं की गई?
और अंत में, जब गुजरात पुलिस बहुत हाईटेक होने का दावा करती है और सरकार जोर-शोर से डंका पीटती है, तब यह समझ में नहीं आता कि ऐसा अधिकारी गणेशवाला पिछले एक हफ्ते से भी अधिक समय तक गिरफ्तारी से बाहर कैसे रहा?
या फिर उसके पीछे कोई बड़ा जुआ माफिया है, जिसके कारण उसे अभी तक पकड़ा नहीं जा सका। यह गुजरात की क थाकथित हाईटेक पुलिस व्यवस्था के लिए शर्मनाक है।
इस पूरे केस में फिलहाल ऐसा लगता है कि एसीबी के आज तक के मामलों में यह सबसे कमजोर केस है, और संभव है कि गणेश वाला बहुत कम दिनों में ही जेल कस्टडी से बाहर आ जाए। राजकीय दबाव से मुक्त होकर भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए एसीबी अपनी शपथ के अनुसार कार्य करे ऐसी उम्मीद सूरत शहर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नगर सेवक श्री असलम भाई साइकिल वाला ने जताई है
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