आजकल छात्रों में झगड़े या मारपीट होने के मनोवैज्ञानिक कारण निम्न हो सकते हैं :
बच्चों को दौड़ का घोड़ा बना दिया गया है :
बच्चा 18 घंटे घर पर रहता है और स्कूल में तो केवल 6 घंटे। लेकिन माता-पिता को केवल अंकों की चिंता रहती है। वे बच्चे को पढ़ाई की दौड़ का घोड़ा समझते हैं।
माता-पिता और बच्चों में धैर्य की कमी :
जब माता-पिता ही अधीर और गुस्सैल हो गए हैं तो बच्चों में भी धैर्य नहीं रहता। विपरीत परिस्थिति में उनका गुस्सा विकृति का रूप ले लेता है। माता-पिता और बच्चे आत्मकेंद्रित होने से सहनशीलता का पूर्ण अभाव है।
शिक्षकों के अधिकार छिन गए हैं :
अगर बच्चा गलत रास्ते पर जाता है और शिक्षक टोकते हैं या सज़ा देते हैं तो आजकल माता-पिता को यह पसंद नहीं। इस कारण बच्चों को खुली छूट मिल जाती है और वे उद्दंड बन जाते हैं।
तनाव और दबाव :
पढ़ाई का दबाव, परीक्षा का तनाव और घर के झगड़े बच्चों के मन पर असर डालते हैं। नतीजतन वे आक्रामक हो जाते हैं।
आत्म-सम्मान की रक्षा :
जब पड़ोसी या सहपाठी बच्चे का अपमान करते हैं तो बच्चे झगड़ पड़ते हैं ताकि वे अपना आत्मसम्मान दिखा सकें।
सहपाठियों का दबाव :
समूह में अपनी जगह बनाए रखने या स्वीकार किए जाने के लिए बच्चे हिंसक व्यवहार अपनाते हैं। “संग ऐसा रंग” वाली स्थिति।
हार का अस्वीकार :
जलन या ईर्ष्या के कारण हार स्वीकार न कर पाने की आदत छात्रों को नकारात्मक और आक्रामक बना देती है।
पारिवारिक परिस्थितियाँ :
जिनके घर का वातावरण तनावपूर्ण या माता-पिता आक्रामक होते हैं, उनके बच्चे भी वही व्यवहार स्कूल में दिखाते हैं।
जानकारी और सलाह का अभाव :
उचित मार्गदर्शन और सकारात्मक माहौल के बिना छात्र अपनी भावनाओं को समझने और नियंत्रित करने में असमर्थ रहते हैं।
अन्य प्रभाव :
सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम्स, नेटफ्लिक्स, क्राइम पेट्रोल और दोस्तों का असर भी आक्रामक व्यवहार को बढ़ाता है।
बच्चों का पक्ष लेने की गलत आदत :
माता-पिता तब भी बच्चों का पक्ष लेते हैं जब वे मोहल्ले या सोसायटी में क्रिकेट खेलकर दूसरों की संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं। इससे बच्चे और उद्दंड हो जाते हैं।
संस्कारों का अभाव :
केवल पैसे होने से जीवन आसान नहीं बनता। घर के बड़े-बुजुर्ग जैसे वातावरण और संस्कार देंगे, बच्चे भी वैसा ही सीखेंगे। आज समस्या यह है कि पिता पैसे कमाने की दौड़ में घर का नियंत्रण खो बैठे हैं।
इसलिए माता-पिता को बच्चों से बातचीत बढ़ानी चाहिए,
उन्हें शांति से समस्याएँ हल करना सिखाना चाहिए,
मानसिक सहयोग देना चाहिए,
और आवश्यकता हो तो शिक्षक या काउंसलर की मदद लेनी चाहिए।
निष्कर्ष :
यदि समय रहते जागरूकता नहीं लाएंगे तो झगड़े और अपराध की घटनाएँ बढ़ती जाएँगी।
बच्चों को केवल सुख-सुविधाएँ, महंगे खिलौने, मोबाइल, साइकिल, स्कूटी देकर पालेंगे तो वे उद्दंड और असंवेदनशील पीढ़ी बनेंगे।
बच्चा गलती करे तो कभी-कभी सख्त अनुशासन आवश्यक है। सीमित डाँट या थप्पड़ भी उसके भविष्य के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
स्कूलों में शारीरिक दंड पर रोक लगने के बाद से बच्चों में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ी है। यदि नियंत्रित अनुशासन न लाया गया तो देश में अपराध दर और बढ़ेगी — ऐसा अनुभव हो रहा है
प्रस्तुत करता संवाददाता राजेंद्र तिवारी सुरत शहर 9879855419
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