बैंकों द्वारा ऋण वसूली के नाम पर दमनकारी तरीकों पर सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी – कानून के दायरे में ही हो वसूली
भारत में बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण वसूली के नाम पर अपनाए जा रहे अमानवीय और दमनकारी तरीकों को लेकर समय-समय पर न्यायपालिका ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। आईसीआईसीआई बैंक बनाम शांति देवी शर्मा (2008) सहित कई महत्वपूर्ण मामलों में न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि ऋण वसूली की प्रक्रिया कानून के दायरे में, मानवीय गरिमा और मौलिक अधिकारों का सम्मान करते हुए ही की जानी चाहिए।
उक्त मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बैंकों को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि SARFAESI अधिनियम जैसे कानूनों का प्रयोग भी मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। किसी भी स्थिति में वसूली एजेंटों द्वारा धमकी, डराने-धमकाने, बल प्रयोग या मानसिक उत्पीड़न अस्वीकार्य है।
इसी प्रकार एचडीएफसी बैंक लिमिटेड बनाम जे.जे. मन्नान (2010) एवं आईसीआईसीआई बैंक बनाम प्रकाश कौर (2007) मामलों में न्यायालय ने यह दोहराया कि बैंक अपने एजेंटों की गतिविधियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते। यदि एजेंट अवैध या अमानवीय व्यवहार करते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी सीधे बैंक की होती है।
साथ ही, कतर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1994) के निर्णय में भी यह स्पष्ट किया गया था कि चाहे सरकारी हो या निजी संस्था—कोई भी व्यक्ति या संस्था कानून से ऊपर नहीं है और किसी भी प्रकार का दबाव, धमकी या हिंसा संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।
इन सभी निर्णयों का सार यही है कि ऋण वसूली आवश्यक हो सकती है, लेकिन मानवाधिकारों की कीमत पर नहीं। बैंकों को चाहिए कि वे अपने वसूली तंत्र पर सख्त निगरानी रखें, एजेंटों को विधिसम्मत प्रशिक्षण दें और किसी भी प्रकार की गैर-कानूनी गतिविधि पर तत्काल कार्रवाई करें।
बैंकों की वसूली प्रक्रियाओं पर प्रभावी नियंत्रण रखें, ताकि आम नागरिकों को मानसिक उत्पीड़न, भय और अपमान का सामना न करना पड़े।भारत के संविधान निर्माता, भारतरत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान का निर्माण इस उद्देश्य से किया था कि देश के प्रत्येक नागरिक को न्याय, सम्मान और अधिकार मिल सके। आज आम नागरिक को बैंक, फाइनेंस कंपनी या एनबीएफसी से ऋण लेने की आवश्यकता पड़ती है, परंतु कई मामलों में ऋण वसूली के नाम पर रिकवरी एजेंटों द्वारा गैरकानूनी, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार किया जाता है, जो संविधान और कानून दोनों के विरुद्ध है।
एक ग्राहक (उधारकर्ता) के कानूनी अधिकार
रिकवरी एजेंट गाली-गलौज, धमकी, डराना, मानसिक उत्पीड़न नहीं कर सकता।
ग्राहक के घर जाकर पड़ोसियों/रिश्तेदारों के सामने अपमानित करना अपराध है।
रात 7 बजे से सुबह 7 बजे तक रिकवरी के लिए कॉल या विज़िट प्रतिबंधित है।
महिला ग्राहक से संपर्क केवल महिला रिकवरी एजेंट ही कर सकती है।
ग्राहक की निजता और गरिमा का सम्मान करना अनिवार्य है।
वाहन या संपत्ति जब्ती के नियम
किस्त बकाया होने पर सड़क से जबरन वाहन छीनना पूरी तरह गैरकानूनी है।
जब्ती केवल लिखित नोटिस, उचित समय और कानूनी प्रक्रिया से ही संभव है।
बैंक की जिम्मेदारी है कि ऋण लेते समय सभी नियम व शर्तें स्पष्ट रूप से बताए।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
ICICI Bank बनाम शांति देवी शर्मा (2008)
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
वसूली के लिए बल, धमकी या अपमान का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
SARFAESI Act का उपयोग भी संवैधानिक अधिकारों के दायरे में ही होगा।
बैंक, एनबीएफसी और रिकवरी एजेंट कानून से ऊपर नहीं हैं।
यह फैसला सभी बैंकों और रिकवरी एजेंटों के लिए स्पष्ट चेतावनी है।
बैंक व रिकवरी एजेंट की जिम्मेदारी
वसूली प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी होनी चाहिए।
ग्राहक को लिखित सूचना, समय और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
धमकी, दबाव या जबरदस्ती दंडनीय अपराध है।
पीड़ित ग्राहक क्या करें?
बैंक/फाइनेंस कंपनी में लिखित शिकायत दर्ज करें।
RBI Banking Ombudsman में शिकायत करें।
गंभीर मामले में पुलिस FIR दर्ज कराई जा सकती है।
उपभोक्ता फोरम या न्यायालय का सहारा लें।
जनहित संदेश
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था:
“शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।”
कानून की जानकारी ही शोषण के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।
अधिक जानकारी के लिए श्री आदेश साबले (क्रिमिनल लॉयर एक्टिविस्ट से संपर्क करें मोबाइल नंबर 8460546005
टी यन न्यूज 24 आवाज जुर्म के खिलाफ गुजरात हेड राजेंद्र तिवारी के साथ राजेश देसाई कि खास रिपोर्ट स्थानीय प्रेस नोट और विज्ञापन के लिए संपर्क करें 9879855419
Updated Video




Subscribe to my channel




