आगरा कॉलेज, आगरा के विधि संकाय में “मातृ भाषा में विधि शिक्षा एवं न्याय” विषय पर संगोष्ठी सम्पन्न

संवाददाता अर्जुन रौतेला। आगरा कॉलेज आगरा के विधि संकाय परिसर में दिनांक 13 फरवरी 2026 (शुक्रवार) को प्रातः 11:30 बजे “मातृ भाषा में विधि शिक्षा एवं न्याय” विषय पर एक महत्वपूर्ण एवं विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम भारतीय भाषा अभियान के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस (पखवाड़ा) के अवसर पर आयोजित किया गया, जिसमें विधि शिक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और मातृभाषा के अंतर्संबंधों पर गहन विमर्श हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर सी. के. गौतम द्वारा की गई।

मुख्य अतिथि के रूप में श्री गोपाल कुलश्रेष्ठ, पूर्व जिला जज उपस्थित रहे।

मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर अरविंद मिश्रा, पूर्व ओएसडी, राज्यपाल उत्तर प्रदेश एवं पूर्व संकायाध्यक्ष एवं विभागाध्यक्ष, विधि विभाग, आगरा कॉलेज ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

विशिष्ट अतिथियों में राजेश कुलश्रेष्ठ, पूर्व डीजीसी (सिविल) आगरा, अंजली वर्मा, एडीजीसी (सिविल), आगरा, कार्यक्रम की संयोजिका प्रोफेसर रीता निगम ने अत्यंत प्रभावशाली एवं गरिमामय ढंग से अतिथियों का परिचय रखा। कार्यक्रम का सफल एवं सुंदर संचालन विधि छात्रा झील गौतम द्वारा किया गया।

संगोष्ठी का शुभारंभ सरस्वती वंदना के साथ माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर किया गया। प्रोफेसर मोअज्जम खान द्वारा स्वागत उद्बोधन दिया और विषय को रखते हुए उन्होंने कहा कि विधि शिक्षा एवं न्यायिक प्रक्रिया का मूल उद्देश्य समाज को न्याय प्रदान करना है, और जब तक न्याय की भाषा जनसामान्य की भाषा नहीं होगी, तब तक न्याय की वास्तविक अनुभूति अधूरी रहेगी। उन्होंने इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया कि वर्तमान में अधिकांश विधिक नजीरें एवं विधिक साहित्य अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं, जिससे सामान्य नागरिक स्वयं को न्यायिक प्रक्रिया से पृथक अनुभव करता है। अतः समय की मांग है कि विधि शिक्षा एवं न्यायिक कार्यवाही को मातृभाषा में सुदृढ़ रूप से स्थापित किया जाए।

श्रीमती अंजलि वर्मा, एडीजीसी (सिविल) ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय भाषा अभियान वर्ष 2012 से प्रारंभ हुआ और इसका उद्देश्य न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्यों में भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन देना है। उन्होंने उल्लेख किया कि उत्तर प्रदेश की राजभाषा हिंदी है तथा वर्तमान में अधीनस्थ न्यायालयों में अनेक आदेश हिंदी में पारित किए जा रहे हैं। उच्च न्यायालयों में भी क्रमशः परिवर्तन दृष्टिगत हो रहा है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 348 के संदर्भ में संसद द्वारा आवश्यक संशोधन की आवश्यकता व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायिक अभ्यावेदन एवं वादपत्र मातृभाषा में स्वीकार किए जाने चाहिए, जिससे पक्षकार अपनी ही भाषा में न्याय को समझ सके। उन्होंने छात्र छात्राओं के साथ ही सभी से आह्वान किया कि वे अपने हस्ताक्षर, पत्राचार, लेटर पैड एवं नेम प्लेट में भी मातृभाषा का प्रयोग करें।

श्री राजेश कुलश्रेष्ठ, पूर्व डीजीसी (सिविल) ने कहा कि जिस व्यक्ति को अपनी भाषा एवं देश पर गर्व नहीं है, वह अपने सांस्कृतिक मूल्यों से विमुख हो जाता है। उन्होंने कहा कि विधि शिक्षा में हिंदी का विशेष महत्व है। जैसे चिकित्सा क्षेत्र में हिंदी को स्वीकार किया जा रहा है, वैसे ही न्यायिक क्षेत्र में भी इसे पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए। उन्होंने इस तथ्य पर बल दिया कि जब निर्णय हिंदी में पारित होते हैं तो पक्षकार स्वयं उसे पढ़ और समझ सकता है तथा किसी प्रकार के भ्रम या शोषण की संभावना कम हो जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय में हिंदी में रिट याचिकाएँ दाखिल हो रही हैं, किंतु अनुवाद में समय अधिक लगता है; अतः प्रक्रिया को सरल एवं त्वरित बनाने की आवश्यकता है।

प्रोफेसर अरविंद मिश्रा ने अपने विस्तृत एवं गहन व्याख्यान में कहा कि मातृभाषा का प्रश्न केवल भाषाई नहीं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक, संवैधानिक एवं तकनीकी आयामों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि न्याय केवल विधिक प्रावधानों का अनुप्रयोग नहीं, बल्कि संवेदनशील संप्रेषण की प्रक्रिया है। मातृभाषा में विधिक शिक्षा से विधि के विद्यार्थी अधिक सशक्त, आत्मविश्वासी एवं व्यावहारिक बनते हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि व्यवस्था की संरचना एवं तकनीकी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। मातृभाषा का ज्ञान अनिवार्य है, किंतु विधिक पारिभाषिक शब्दावली के मानकीकरण एवं संस्थागत समन्वय की दिशा में गंभीर प्रयास अपेक्षित हैं।

पूर्व जिला जज गोपाल कुलश्रेष्ठ ने कहा कि पूर्व में अधीनस्थ न्यायालयों में अधिकांश कार्य अंग्रेज़ी में होते थे, किंतु वर्तमान में जिला न्यायालयों में हिंदी का व्यापक प्रयोग हो रहा है। इससे न्यायिक संप्रेषण अधिक सुलभ एवं पारदर्शी हुआ है। उन्होंने कहा कि जब आदेश मातृभाषा में दिए जाते हैं तो पक्षकार उसे समझकर सुझाव दे सकता है; अन्यथा वह केवल औपचारिक हस्ताक्षर तक सीमित रह जाता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि स्थानीय भाषाओं में ड्राफ्टिंग एवं बहस से न्याय अधिक जनोन्मुखी बनता है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्राचार्य प्रोफेसर सी. के. गौतम ने कहा कि राष्ट्रभाषा से ही राष्ट्र का सम्मान सुनिश्चित होता है। साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण एवं संवर्धन भी समान रूप से आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालय में हिंदी में निर्णय पारित किए जा रहे हैं, जो एक सकारात्मक परिवर्तन है। राष्ट्रभाषा का ज्ञान व्यक्तिगत विकास, बौद्धिक स्वाभिमान एवं राष्ट्रीय एकात्मता के लिए अनिवार्य है।

कार्यक्रम के समापन पर सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए। अंत में प्रोफेसर डी. सी. मिश्रा, विभागाध्यक्ष, विधि संकाय द्वारा सभी अतिथियों, शिक्षकों, छात्र-छात्राओं एवं आयोजन में सहयोग प्रदान करने वाले समस्त कर्मचारियों के प्रति आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित किया गया।

संगोष्ठी में विधि संकाय के वरिष्ठ शिक्षकों में प्रमुख रूप से प्रोफेसर डी. सी. मिश्रा, प्रोफेसर एम. एम. खान, प्रोफेसर रीता निगम, प्रोफेसर उमेश कुमार, प्रोफेसर गौरव कौशिक, प्रोफेसर संजीव शर्मा, प्रोफेसर रिजु निगम, प्रोफेसर शोभनाथ जैसल, डॉ. शिव वीर सिंह, प्रोफेसर मनीष शंकर तिवारी, प्रोफेसर एसके दुबे, प्रोफेसर अमरनाथ, डॉ. सुधेंद्रनाथ, डॉ. अर्चना यादव, डॉ. कृष्ण वीर यादव, डॉ. अजहर अली खान, डॉ. फिरोज अंसारी, डॉ. निधि शर्मा, डॉ. सरोज कुमार, प्रोफेसर राकेश कुमार, डॉ. गीता उपाध्याय, डॉ. प्रमोद कुमार सिंह, डॉ. रणवीर सिंह, डॉ. सुखवीर सिंह, डॉ. सुनील शर्मा, डॉ. कुमार गौरव प्रताप सिंह, डॉ. आदर्श प्रताप राव, डॉ. विजय सिंह राणा, डॉ. वसुधा अग्रवाल, डॉ. कुमकुम अग्रवाल, डॉ. निशा अग्रवाल, डॉ. शिवानी सेठ, डॉ. अमरेंद्र सिंह, डॉ. संतोष कुमार सिंह, डॉ. मनिका टंडन, डॉ. जलज कुलश्रेष्ठ, डॉ. अगम दीक्षित सहित अनेक शिक्षकगण उपस्थित रहे।

कर्मचारीगण में लक्ष्मीकांत एवं नरेंद्र सहित अन्य कर्मचारियों का सहयोग सराहनीय रहा। बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने सहभागिता कर कार्यक्रम को सफल बनाया।

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gc goyal rajan
  • अर्जुन रौतेला आगरा

    रंग लाती है हिना पत्थर से पिस जाने के बाद। सुर्ख रूह होता है इंसान ठोकरें खाने के बाद।। मेहंदी का रंग प्राप्त करने के लिए उसको पत्थर पर पिसा जाता है, तब लोग उसकी तरफ आकर्षित होते हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य जो जितना "दर्द अथवा कठिन कर्म" करता है, लोग उसी की तरफ आकर्षित होते हैं।

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