प्रतिभा किसी बहाने की मोहताज नहीं: जैसलमेर के ‘भागीरथ’ दिनेश चौहान

संवाददाता अर्जुन रौतेला। कहते हैं कि हौसले बुलंद हों तो शारीरिक अक्षमता कभी मार्ग की बाधा नहीं बनती। आज के आधुनिक युग में जहाँ लोग स्वार्थ की अंधी दौड़ में शामिल हैं, वहीं राजस्थान के जैसलमेर (रामदेवरा) के दिनेश चौहान नि:स्वार्थ सेवा की एक ऐसी ‘गंगा’ प्रवाहित कर रहे हैं, जो समाज और पर्यावरण दोनों को पल्लवित कर रही है।

दिनेश ने मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में अपनी आँखों की रोशनी खो दी थी। लेकिन उन्होंने अपनी दृष्टि खोने को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी शक्ति बनाया। आज वे आँखों से दिव्यांग होते हुए भी लाखों युवाओं के लिए एक ‘Youth Icon’ के रूप में उभर रहे हैं। उनकी उच्च शिक्षा (M.A.) उनके जुझारूपन का प्रमाण है।

दिनेश चौहान के लोक कल्याणकारी कार्यों का बखान शब्दों में करना कठिन है। उनकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

सैकड़ों वृक्षों का रोपण: उन्होंने अब तक सैकड़ों पेड़-पौधे लगाकर मरुभूमि को हरा-भरा करने का बीड़ा उठाया है।

पेंशन का सदुपयोग: सबसे अनुकरणीय बात यह है कि उन्हें मिलने वाली दिव्यांग पेंशन का 100% हिस्सा वे इन्हीं सामाजिक और पर्यावरणीय कार्यों में खर्च कर देते हैं।

प्रेरणा पुंज: एक दिव्यांग व्यक्ति का पर्यावरण के प्रति यह समर्पण उन्हें समाज की मुख्यधारा के लोगों से कहीं ऊँचा और महान बनाता है।

एक साहित्यकार के नाते मेरा (दीपक राजोरा) समाज और प्रशासन से यह विनम्र आग्रह है:

प्रशासनिक सहयोग: राजस्थान सरकार को चाहिए कि ऐसे कर्मठ व्यक्ति को सरकारी नर्सरी से नि:शुल्क पौधे उपलब्ध कराए जाएं।

प्रोत्साहन: सरकारी पदों पर आसीन अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और नेताओं को समय-समय पर उन्हें सम्मानित और प्रोत्साहित करना चाहिए।

जन भागीदारी: आम जनता को भी उनके कार्यों से प्रेरणा लेकर पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।

निष्कर्ष: दिनेश चौहान का जीवन हमें सिखाता है कि सेवा करने के लिए आँखों की नहीं, बल्कि एक साफ़ और बड़े ‘दिल’ की ज़रूरत होती है।

अन्य खबरों हेतु संपर्क करें संवाददाता अर्जुन रौतेला 8868868461

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gc goyal rajan
  • अर्जुन रौतेला आगरा

    रंग लाती है हिना पत्थर से पिस जाने के बाद। सुर्ख रूह होता है इंसान ठोकरें खाने के बाद।। मेहंदी का रंग प्राप्त करने के लिए उसको पत्थर पर पिसा जाता है, तब लोग उसकी तरफ आकर्षित होते हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य जो जितना "दर्द अथवा कठिन कर्म" करता है, लोग उसी की तरफ आकर्षित होते हैं।

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