संवादाता अर्जुन रौतेला। इस सर्दी में दिल्ली एनसीआर एक ऐसी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती से जूझ रहा है, जो पहले से कहीं ज़्यादा गंभीर महसूस हो रही है। क्षेत्र भर के क्लीनिकों, डायग्नोस्टिक सेंटर्स और अस्पतालों में लगातार ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जो लगातार खाँसी, लंबे समय तक रहने वाला बुखार, सीने में जकड़न और अत्यधिक थकान की शिकायत कर रहे हैं। इस मौसम को अलग बनाता है सिर्फ मामलों की संख्या नहीं, बल्कि बीमारी की अवधि और उसकी गंभीरता। कई लोग बता रहे हैं कि ठीक होने में अब दिनों की जगह हफ्ते लग रहे हैं और पूरे-के-पूरे परिवार एक के बाद एक बीमार पड़ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी वजह दो खतरनाक स्थितियों का एक साथ होना है — मौसमी वायरल संक्रमणों में तेज़ बढ़ोतरी और लगातार बनी हुई जहरीली वायु गुणवत्ता।
दिल्ली सरकार के अस्पतालों और निजी स्वास्थ्य नेटवर्क से संकलित आंकड़ों के अनुसार, 2025 की आख़िरी तिमाही में फ्लू जैसे लक्षणों और वायरल श्वसन रोगों के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। एक शहर-स्तरीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण में सामने आया कि दिल्ली एनसीआर के लगभग 10 में से 7 घरों में सर्दियों के चरम महीनों के दौरान कम से कम एक सदस्य वायरल या श्वसन संबंधी बीमारी से प्रभावित हुआ। बड़े अस्पतालों के डॉक्टरों ने इन्फ्लुएंजा ए के H3N2 स्ट्रेन को इसका प्रमुख कारण बताया। इसके लक्षणों में तेज़ बुखार, गले में खराश, बदन दर्द और गंभीर खाँसी शामिल हैं, जो सामान्य मौसमी फ्लू की तुलना में कहीं ज़्यादा समय तक बने रहते हैं।
वायरल बीमारियों में यह बढ़ोतरी ऐसे समय पर हुई है, जब राजधानी क्षेत्र की वायु गुणवत्ता लगातार खराब बनी हुई है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) के आधिकारिक वायु निगरानी आंकड़ों के अनुसार, नवंबर और दिसंबर के दौरान दिल्ली एनसीआर के बड़े हिस्सों में कई हफ्तों तक वायु गुणवत्ता सूचकांक “बहुत खराब” से लेकर “गंभीर” श्रेणी में दर्ज किया गया। इस अवधि में PM2.5 का स्तर सुरक्षित भारतीय मानकों से कई गुना अधिक रहा, जिसके चलते स्वास्थ्य चेतावनियाँ जारी की गईं, स्कूलों को सतर्क किया गया और बाहरी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए। बारिश या हवा की दिशा बदलने से थोड़े समय के लिए सुधार ज़रूर हुआ, लेकिन अधिकांश लोगों के लिए प्रदूषित हवा के संपर्क में रहना लगातार बना रहा।

चिकित्सा विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रदूषित हवा वायरल संक्रमणों को और गंभीर बना देती है। महीन कणों के लगातार संपर्क से श्वसन तंत्र में सूजन आती है, फेफड़ों की ऊतक संरचना को नुकसान पहुँचता है और शरीर की संक्रमण से लड़ने की पहली रक्षा पंक्ति कमजोर हो जाती है। जब H3N2 जैसे वायरस पहले से प्रदूषण से प्रभावित फेफड़ों पर हमला करते हैं, तो बीमारी ज़्यादा गंभीर हो जाती है और ठीक होने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। यही वजह है कि इस मौसम में कई मरीजों को बुखार उतरने के बाद भी लंबे समय तक खाँसी, साँस फूलना और कमजोरी महसूस हो रही है।
दिल्ली एनसीआर के अस्पतालों ने श्वसन संबंधी बीमारियों के कारण भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में वृद्धि दर्ज की है, खासकर बच्चों और बुज़ुर्गों में। कई सरकारी अस्पतालों ने प्रदूषण के चरम दिनों में ब्रोंकाइटिस और निमोनिया के मामलों में बढ़ोतरी की पुष्टि की है, वहीं निजी अस्पतालों में ऐसे कामकाजी उम्र के लोग भी पहुँच रहे हैं, जिन्हें पहले कोई गंभीर बीमारी नहीं थी, लेकिन अब उन्हें साँस लेने में तकलीफ और सीने में जकड़न महसूस हो रही है। ओपीडी पर लगातार दबाव बना हुआ है और डॉक्टरों को ऐसे मरीज बार-बार लौटते हुए मिल रहे हैं, जिनके लक्षण पूरी तरह ठीक नहीं हो पा रहे।
डायग्नोस्टिक सेंटर्स में भी जांच के रुझानों में साफ बदलाव देखा जा रहा है। *बायोसिटी हेल्थ केयर में चिकित्सकों* और लैब टीमों ने लंबे समय तक चलने वाले वायरल लक्षणों और श्वसन संबंधी शिकायतों के कारण जांच के लिए भेजे जाने वाले मरीजों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है। डॉक्टर अब संक्रमण की गंभीरता समझने और जटिलताओं को समय रहते पहचानने के लिए ब्लड जांच पर अधिक निर्भर हो रहे हैं। *कम्प्लीट ब्लड काउंट (CBC)* से वायरल और बैक्टीरियल संक्रमण के बीच अंतर समझने में मदद मिलती है, जबकि *सी-रिएक्टिव प्रोटीन (CRP)* और ESR शरीर में चल रही सूजन के स्तर को दर्शाते हैं। साँस फूलने या कमजोरी की शिकायत वाले मरीजों में हीमोग्लोबिन की जाँच कर शरीर की ऑक्सीजन वहन क्षमता का आकलन किया जाता है। ये जांच डॉक्टरों को अनावश्यक दवाओं से बचने और सही समय पर सही इलाज शुरू करने में मदद कर रही हैं।
घरों के भीतर इसका असर बेहद परेशान करने वाला रहा है। माता-पिता बता रहे हैं कि बच्चों को बार-बार खाँसी और बुखार के कारण स्कूल छोड़ना पड़ रहा है। ऑफिस जाने वाले लोग लगातार थकान, काम पर ध्यान न लग पाने और बार-बार छुट्टी लेने की शिकायत कर रहे हैं। कई परिवारों का कहना है कि एक सदस्य आंशिक रूप से ठीक होता है, तभी दूसरा बीमार पड़ जाता है, जिससे बीमारी का सिलसिला हफ्तों तक चलता रहता है। डॉक्टर इसका कारण अत्यधिक वायरल संपर्क, कमजोर इम्युनिटी, तनाव, नींद की कमी और शहरी जीवनशैली में आम पोषण संबंधी कमियों को मानते हैं।
बच्चे, बुज़ुर्ग और अस्थमा, हृदय रोग या मधुमेह से पीड़ित लोग अब भी सबसे अधिक जोखिम में हैं। हालांकि डॉक्टर इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि अब ऐसे स्वस्थ वयस्कों की संख्या बढ़ रही है, जिन्हें लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ रही है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि पर्यावरणीय दबाव सभी आयु वर्गों की प्रतिरोधक क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर कर रहा है, जिससे सामान्य वायरल संक्रमण भी गंभीर रूप ले रहा है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वायु गुणवत्ता में ठोस सुधार नहीं हुआ, तो ऐसी संयुक्त स्वास्थ्य समस्याएँ अपवाद नहीं बल्कि सामान्य स्थिति बन सकती हैं। मौसमी वायरस तो फैलते रहेंगे, लेकिन प्रदूषित हवा यह सुनिश्चित कर रही है कि उनका असर ज़्यादा गंभीर और लंबे समय तक रहने वाला हो। इसका आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है, क्योंकि परिवारों को बढ़ते इलाज खर्च, काम के दिनों की हानि और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ती निर्भरता का सामना करना पड़ रहा है।

दिल्ली एनसीआर के निवासियों के लिए इस सर्दी का सबक साफ है। मौसमी बीमारी को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता। वायु गुणवत्ता पर नज़र रखना, समय पर डॉक्टर से परामर्श लेना और लक्षण लंबे समय तक बने रहने पर उचित जांच कराना अब ज़रूरी हो गया है। साधारण एहतियाती कदम और समय पर स्वास्थ्य जांच ऐसे माहौल में जटिलताओं को काफी हद तक कम कर सकती हैं, जहाँ प्रदूषण और संक्रमण साथ-साथ चल रहे हैं।
दिल्ली की मौजूदा स्थिति यह याद दिलाती है कि स्वास्थ्य का सीधा संबंध उस वातावरण से है, जिसमें हम रहते हैं। जब तक स्वच्छ हवा और निवारक स्वास्थ्य देखभाल को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तब तक राजधानी क्षेत्र के परिवार सिर्फ बीमार पड़ने का ही नहीं, बल्कि ज़रूरत से ज़्यादा समय तक बीमार रहने का बोझ उठाते रहेंगे।
पिछले एक वर्ष में दिल्ली एनसीआर के कई परिवारों ने बार-बार होने वाले वायरल बुखार, लगातार खाँसी और लंबे समय तक ठीक होने की समस्या का अनुभव किया है, खासकर उन दिनों में जब वायु प्रदूषण का स्तर अधिक रहा। आपके व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर, क्या आपको लगता है कि बिगड़ती वायु गुणवत्ता आपके परिवार की इम्युनिटी को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है और मौसमी बीमारियों को पहले की तुलना में अधिक बार या अधिक गंभीर बना रही है? आपने बच्चों, बुज़ुर्ग सदस्यों या घर के कामकाजी लोगों में क्या बदलाव महसूस किए हैं, और इस समस्या से निपटने के लिए आपके अनुसार समाज या शहर स्तर पर क्या सुधार किए जाने चाहिए?
अन्य खबरों हेतु संपर्क करें संवाददाता अर्जुन रौतेला 8868868461
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