कोलकाता / सोनारपुर। पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए भीषण हमले ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। शनिवार को जब अभिषेक बनर्जी चुनाव के बाद हुई हिंसा के पीड़ित टीएमसी कार्यकर्ता ‘संजू कर्मकार’ के परिवार से मिलने पहुंचे, तो उन पर पत्थरों, जूतों और अंडों से हमला किया गया। स्थिति इतनी गंभीर थी कि उन्हें बचाने के लिए सुरक्षाकर्मियों को हेलमेट पहनाना पड़ा और उनकी कमीज तक फट गई।
जहां एक तरफ टीएमसी इसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा प्रायोजित ‘जानलेवा साजिश’ बता रही है, वहीं दूसरी तरफ इस हमले के पीछे एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक कोण भी उभरकर सामने आ रहा है। राजनीतिक गलियारों और स्थानीय हलकों में यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि क्या यह हमला सिर्फ राजनीतिक प्रतिशोध है, या फिर चुनाव के दौरान टीएमसी नेताओं द्वारा दिए गए विवादित बयानों और सालों से पीड़ित स्थानीय जनता के संचित आक्रोश का नतीजा है?
क्या बयानों और चुनावी हिंसा से उपजा है जनता का रोष?
पश्चिम बंगाल की राजनीति को करीब से देखने वाले विश्लेषकों और जमीनी सूत्रों का मानना है कि इस हमले के पीछे जनता और विपक्षी कार्यकर्ताओं में लंबे समय से भरा गुस्सा एक मुख्य कारण हो सकता है। चुनाव के दौरान राज्य में बड़े पैमाने पर हिंसा, आगजनी और मारपीट की घटनाएं सामने आई थीं।
1. चुनाव के समय दिए गए तीखे और विवादित बयान
चुनाव प्रचार के दौरान अभिषेक बनर्जी समेत टीएमसी के कई शीर्ष नेताओं ने विपक्षी दलों और उनके समर्थकों के खिलाफ बेहद आक्रामक और तीखे बयान दिए थे। कई रैलियों में ऐसे बयान सामने आए थे जिन्हें विपक्ष ने ‘धमकी और उकसावा’ माना था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नेताओं के इन विवादित बयानों के कारण ही जमीन पर हिंसा भड़की, जिससे कई निर्दोष परिवारों को प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
2. ‘चोर-चोर’ के नारों के पीछे का सच
सोनारपुर में जब अभिषेक बनर्जी का काफिला पहुंचा, तो उग्र भीड़ ने केवल पत्थर ही नहीं फेंके, बल्कि “चोर-चोर” के नारे भी लगाए। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने टीएमसी के आरोपों को खारिज करते हुए इसे जनता का स्वतःस्फूर्त आक्रोश बताया है। उनका कहना है:
“यह किसी पार्टी का हमला नहीं है, बल्कि उन स्थानीय लोगों का गुस्सा है जिन्हें सालों से प्रताड़ित और शोषित किया गया है। अतीत में रूपा गांगुली से लेकर दक्षिण 24 परगना के हमारे तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं पर जो बर्बर हमले टीएमसी ने किए थे, उसे लोग भूले नहीं हैं। लोकतंत्र में हिंसा ठीक नहीं है, लेकिन यह जनता के दबे हुए गुस्से का विस्फोट है।”
टीएमसी का पलटवार: “हार की बौखलाहट और प्रतिशोध की राजनीति”
दूसरी ओर, इस हमले के बाद तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह से आक्रामक मोड में है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र और राज्य की नई प्रशासनिक व्यवस्था के तहत जानबूझकर अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा को घटाया गया, जिसके कारण केवल दो सुरक्षाकर्मी उनके साथ थे।
ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यहां तक दावा किया कि हमले के बाद गंभीर रूप से घायल अभिषेक बनर्जी को अस्पताल में भर्ती न करने के लिए भी प्रशासनिक दबाव बनाया गया। टीएमसी का स्पष्ट कहना है कि अभिषेक बनर्जी चुनावी हिंसा के शिकार अपने कार्यकर्ता के परिवार का दुख बांटने गए थे, और उन पर हमला करके विपक्ष बंगाल के लोगों के आत्मसम्मान और उनके ‘दर्द’ का राजनीतिक इंतकाम ले रहा है।
सोनारपुर हिंसा और उसके दो पहलू
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पक्ष (TMC का आरोप) | विपक्ष (BJP और स्थानीय लोगों का तर्क)
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1. बीजेपी समर्थित गुंडों ने | 1. टीएमसी के चुनावी बयानों और सालों के
जानबूझकर हमला किया। | अत्याचार के खिलाफ जनता का गुस्सा।
2. सुरक्षा में भारी चूक, जान | 2. जनता ने "चोर-चोर" के नारे लगाकर
लेने की थी साजिश। | स्थानीय भ्रष्टाचार पर आक्रोश जताया।
3. पीड़ित परिवारों से मिलने | 3. टीएमसी के शासन में विपक्षी कार्यकर्ताओं
पर राजनीति की जा रही है। | पर हुई हिंसा का यह प्राकृतिक 'रिएक्शन' है।
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कोर्ट और जनता की अदालत में जाएगा मामला
अभिषेक बनर्जी ने साफ कर दिया है कि इस पूरी घटना के वीडियो फुटेज उनके पास उपलब्ध हैं और वे इस मामले को कोलकाता हाई कोर्ट लेकर जाएंगे। उन्होंने कहा, “वे मेरा शरीर गिरा सकते हैं, लेकिन मेरा संकल्प अटूट है। मैं कोर्ट और राज्यपाल दोनों के पास इस मामले को उठाऊंगा।”
इस घटना के बाद बंगाल पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 5 लोगों को गिरफ्तार भी किया है। बहरहाल, कारण चाहे जो भी हो—नेताओं के विवादित बयानों का असर या फिर राजनीतिक प्रतिशोध—सोनारपुर की इस घटना ने साफ कर दिया है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव खत्म होने के बाद भी सियासी अदावत और हिंसा की आग ठंडी होने का नाम नहीं ले रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा सड़कों से लेकर अदालत तक और ज्यादा तूल पकड़ने वाला है।

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