उग्रं वीरं महाविष्णुं” मंत्रोच्चार के साथ हुआ दिव्य नृसिंह हवन, पूर्णाहुति एवं भंडारे संग श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव सम्पन्न

अर्जुन रौतेला आगरा। इस्कॉन आगरा एवं राधा सखी ग्रुप के संयुक्त तत्वावधान में समाधि पार्क, सूर्य नगर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव का समापन भगवान नृसिंहदेव के दिव्य हवन, पूर्णाहुति एवं विशाल भंडारे के साथ भक्तिमय वातावरण में सम्पन्न हुआ। “उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युर्मृत्युं नमाम्यहम्॥” मंत्र के गूंजते स्वर के बीच श्रद्धालुओं ने आहुति अर्पित कर भगवान नृसिंहदेव से सुख, शांति और धर्म रक्षा की प्रार्थना की।

अरविंद स्वरूप प्रभु के सानिध्य में सम्पन्न हुए नृसिंह हवन में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। हवन के दौरान पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति भाव से ओतप्रोत हो उठा। श्रद्धालु हरे कृष्ण महामंत्र एवं नृसिंहदेव के जयकारों के साथ भक्ति में लीन दिखाई दिए।

कथा व्यास सार्वभौम प्रभु ने कथा विश्राम अवसर पर कहा कि भगवान नृसिंहदेव भक्तों की रक्षा और अधर्म के विनाश के प्रतीक हैं। समापन अवसर पर विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर धर्म लाभ प्राप्त किया।

कार्यक्रम में राधा सखी ग्रुप की संस्थापिका अशु मित्तल, अदिति गौरंगी, मोनिका अग्रवाल, रीता खन्ना, लवली कथूरिया, संजीव मित्तल, रेनू भगत, मीनाक्षी मोहन, ज्योति, रेशमा मगन, रेनू लांबा, तनुजा मांगलिक, डॉ अपर्णा पोद्दार, डॉ परिणीता बंसल, शिखा सिंघल आदि उपस्थित रहीं।

सार्वभौम प्रभु ने कहा कि आज समाज में धार्मिकता तो बहुत बढ़ गई है, पूजा-पाठ और कर्मकांड भी अधिक हो रहे हैं, लेकिन आत्मा का चिंतन और वास्तविक अध्यात्म लोगों के जीवन से दूर होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का मार्ग है। जब तक मनुष्य आत्मा का अध्ययन नहीं करेगा, तब तक जीवन में वास्तविक शांति और संतुलन संभव नहीं है।

अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए सार्वभौम प्रभु ने बताया कि उनका मूल जन्म सिंध, पाकिस्तान के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके घर-परिवार में राधा-कृष्ण के मंदिर हुआ करते थे और बचपन से ही धार्मिक वातावरण मिला। इसके बावजूद उन्होंने विज्ञान की शिक्षा को चुना और आगे चलकर एमबीबीएस एमडी की पढ़ाई की।

उन्होंने बताया कि मेडिकल शिक्षा के दौरान उनकी भेंट एक अमेरिकी वैष्णव संत से हुई, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। श्रीकृष्ण भक्ति और वैष्णव दर्शन से प्रभावित होकर उन्होंने स्वयं को भक्ति मार्ग के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया। पाकिस्तान में मेडिकल कॉलेज के दौरान उन्होंने चिकित्सा अभ्यास के स्थान पर शिक्षण कार्य को अधिक महत्व दिया और साथ ही धर्म सभाओं के माध्यम से लोगों को श्रीकृष्ण भक्ति की ओर प्रेरित करना शुरू किया।

सार्वभौम प्रभु ने बताया कि उनकी धर्म सभाएं इतनी प्रेरणादायी होने लगीं कि अनेक मुस्लिम समुदाय के लोग भी श्रीकृष्ण भक्ति की ओर आकर्षित होने लगे। इसे देखकर पाकिस्तान सरकार और वहां की एजेंसियों ने उन पर निगरानी रखनी शुरू कर दी। उन्हें यह आशंका होने लगी कि उनकी सभाएं लोगों को हिंदू आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित कर रही हैं। बाद में इस्कॉन के माध्यम से उन्हें भारत भेज दिया गया।

उन्होंने कहा कि पिछले लगभग 50 वर्षों से वे भारत सहित विभिन्न देशों में श्रीकृष्ण भक्ति और अध्यात्म का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। 75 वर्ष की आयु में व्हीलचेयर पर रहने के बावजूद उनका जीवन पूरी तरह श्रीकृष्ण सेवा और भक्ति के लिए समर्पित है। उन्होंने कहा कि विदेशों में आज भी अध्यात्म और धर्म सभाओं के प्रति लोगों में अत्यधिक जिज्ञासा और आकर्षण दिखाई देता है, क्योंकि वहां आध्यात्मिक शून्यता अधिक है। जबकि भारत में, जहां सनातन संस्कृति की समृद्ध परंपरा है, वहां के लोग धीरे-धीरे अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि आज भारत पूरी तरह पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होता जा रहा है, जिससे आध्यात्मिक पतन हो रहा है। हम अपने बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा दिलाना चाहते हैं, लेकिन संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा से दूर कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए, लेकिन मानसिक गुलामी आज भी हमारे भीतर बनी हुई है। उसी प्रकार मुगल शासन समाप्त हो गया, किंतु उसका प्रभाव और भय आज भी मानसिकता में कहीं न कहीं विद्यमान है।

सार्वभौम प्रभु ने कहा कि सनातन धर्म आत्मा का धर्म है और प्रत्येक मनुष्य की आत्मा सनातनी है। धार्मिक लोग आपस में विवाद कर सकते हैं, लेकिन जो व्यक्ति वास्तव में आध्यात्मिक हो जाता है और आत्मा का अध्ययन कर लेता है, वह कभी संघर्ष और वैमनस्य का मार्ग नहीं अपनाता। उन्होंने कहा कि आज हम धर्म की बातें तो करते हैं, लेकिन अपने धार्मिक प्रतीकों और संस्कारों को जीवन में अपनाने से दूर भागते हैं। धोती, तिलक, शिखा, जनेऊ और वैदिक संस्कारों को आधुनिकता के नाम पर छोड़ते जा रहे हैं।

अन्य खबरों हेतु संपर्क करें संवाददाता अर्जुन रौतेला 8868868461

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  • अर्जुन रौतेला आगरा

    रंग लाती है हिना पत्थर से पिस जाने के बाद। सुर्ख रूह होता है इंसान ठोकरें खाने के बाद।। मेहंदी का रंग प्राप्त करने के लिए उसको पत्थर पर पिसा जाता है, तब लोग उसकी तरफ आकर्षित होते हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य जो जितना "दर्द अथवा कठिन कर्म" करता है, लोग उसी की तरफ आकर्षित होते हैं।

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