पाकुड़ की राजनीति गरमाई: कांग्रेस महासचिव मोनीता कुमारी ने उपायुक्त से की उच्चस्तरीय जांच की मांग, कहा- ‘जनता के पैसों का हिसाब देना होगा’
पाकुड़: नगर परिषद में कथित टेंडर मैनेजिंग और संभावित भ्रष्टाचार का मामला अब पूरी तरह तूल पकड़ता जा रहा है। इस संवेदनशील मामले के सामने आने के बाद से पूरे जिले की सियासत में भूचाल आ गया है। जिला कांग्रेस कमिटी की महासचिव एवं पूर्व वार्ड पार्षद मोनीता कुमारी ने अब इस लड़ाई को सीधे प्रशासनिक चौखट पर ला खड़ा किया है। उन्होंने उपायुक्त (DC) को एक लिखित शिकायत पत्र सौंपकर नगर परिषद के टेंडरों, विकास योजनाओं और सभी वित्तीय कार्यों की उच्चस्तरीय जांच कराने की पुरजोर मांग की है।
करोड़ों की योजनाओं में पारदर्शिता पर सवाल
मोनीता कुमारी ने अपने आवेदन में सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि नगर परिषद में वर्तमान समय में चल रही करोड़ों रुपये की योजनाओं में पारदर्शिता के नियमों को ताक पर रख दिया गया है। जब उन्होंने इन गड़बड़ियों को सार्वजनिक रूप से उठाना शुरू किया और इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की, तो उन्हें चुप कराने की कोशिशें तेज कर दी गईं।
“अगर भ्रष्टाचार नहीं हुआ है तो जांच से डर क्यों? जनता के पैसों का हिसाब देना होगा। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है और न ही किसी को डराकर चुप कराया जा सकता है।” — मोनीता कुमारी, महासचिव, जिला कांग्रेस कमिटी
परिवार को झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी का आरोप
कांग्रेस नेता ने एक बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि नगर परिषद में व्याप्त कथित अनियमितताओं के खिलाफ आवाज दबाने के लिए अब दबाव और डर की राजनीति का सहारा लिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि उनके पिता भीम सिंह, जो वर्तमान में वार्ड पार्षद हैं, को कथित रूप से झूठे मुकदमों में फंसाने और उनके पूरे परिवार को मानसिक व सामाजिक रूप से प्रताड़ित करने की धमकियां दी जा रही हैं। मोनीता कुमारी ने जिला प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्षता से जांच कराई जाए और धमकी देने वाले व भ्रष्टाचार में संलिप्त दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।
जनता के बीच उठे गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद पाकुड़ के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। अब स्थानीय जनता के बीच भी कई तीखे सवाल तैर रहे हैं:
क्या नगर परिषद में चल रहे विकास कार्यों में वाकई सब कुछ पारदर्शी है?
अगर व्यवस्था पूरी तरह साफ-सुथरी है, तो फिर उच्चस्तरीय जांच से परहेज क्यों किया जा रहा है?
क्या वाकई पाकुड़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले जनप्रतिनिधियों और उनके परिवारों को डराकर चुप कराने की कोशिश हो रही है?
फिलहाल इस पूरे मामले को लेकर गेंद जिला प्रशासन के पाले में है। अब देखना यह होगा कि उपायुक्त इस गंभीर शिकायत पर क्या कदम उठाते हैं। पाकुड़ की जनता की निगाहें अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं, क्योंकि हर कोई जानना चाहता है कि नगर परिषद के इन बंद कमरों का आखिर सच क्या है।

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