गुजरात प्रदेश सूरत शहर में पिछले कई वर्षों से शहर में मानव निर्मित खाड़ी बाढ़ की समस्या गंभीर बनी हुई है। नागरिकों के जीवन को खतरा, करोड़ों रुपये का नुकसान और व्यापार-धंधों में बाधा उत्पन्न होने के बावजूद सरकार की ओर से बाढ़ रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
जागरूक नागरिक हितेश जसोलिया और संजय इजावा ने इस मुद्दे पर गुजरात राज्य मानवाधिकार आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया था कि वर्ष 2020 से 2025 तक खाड़ियों में हुए अतिक्रमण और लापरवाही के कारण सूरत महानगरपालिका के वराछा ज़ोन क्षेत्र में नागरिक बार-बार बाढ़ की मार झेल रहे हैं। साथ ही, आयोग से मांग की गई थी कि बाढ़ के मुख्य कारणों की जांच कर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए तथा प्रभावित नागरिकों को मुआवजा दिलाया जाए।
यह शिकायत आयोग में SCT-91/2025 के रूप में दर्ज की गई थी। परंतु 08.08.2025 को आयोग ने आदेश देते हुए बताया कि “यह विषय बड़े पैमाने की योजनाओं, प्राकृतिक आपदा का आकलन तथा कई संस्थाओं के समन्वय से ही हल हो सकता है, जो राज्य सरकार की नीतिगत बात है। इसलिए प्रकरण दफ़्तर भेजा जाता है।”
इस निर्णय पर शिकायतकर्ता संजय इजावा ने आरोप लगाया कि सरकार को बचाने के लिए ही राज्य मानवाधिकार आयोग ने यह आदेश दिया है। उनका कहना है कि संविधान द्वारा नागरिकों को मिला अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) स्वस्थ वातावरण में जीने के अधिकार को भी समाहित करता है, जिसे न्यायपालिका ने स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त वातावरण के अधिकार तक विस्तारित किया है। यह संवैधानिक संरक्षण अनुच्छेद 48A द्वारा समर्थित है, जो राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने का निर्देश देता है, तथा अनुच्छेद 51A(g), जो नागरिकों को प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने का मूल कर्तव्य सौंपता है।
अब इस मामले को आगामी दिनों में गुजरात उच्च न्यायालय तक ले जाने की तैयारी की जा रही है।
टी यन न्यूज 24 आवाज जुर्मके खिलाफ सूरत से संवाददाता राजेंद्र तिवारी के साथ नरेंद्र प्रताप सिंह कि खास रिपोर्ट स्थानीय प्रेस नोट और विज्ञापन के लिए संपर्क करें 9879855419
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