डीपीएस आगरा में पं. सलिल भट्ट की वीणा से गूंजा राग परमेश्वरी, सुरों ने बांधा समां

अर्जुन रौतेला आगरा। शास्त्रीय संगीत की मधुर स्वर लहरियों और भारतीय संस्कृति की झलक से दिल्ली पब्लिक स्कूल, शास्त्रीपुरम परिसर का वातावरण संगीतमय हो उठा। स्पिकमैके के ‘विरासत 2026’ कार्यक्रम के अंतर्गत प्रख्यात वीणा वादक पं. सलिल विश्व मोहन भट्ट ने राग परमेश्वरी की मनमोहक प्रस्तुति देकर विद्यार्थियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा से परिचित कराया। उनके साथ बनारस घराने के प्रसिद्ध तबला वादक पं. हिमांशु महंत ने संगत की। तबले पर तीन ताल में उनकी लयकारी ने प्रस्तुति को और प्रभावशाली बना दिया।


यह कार्यक्रम दिवंगत अभिनेता नाना पाटेकर को समर्पित था, जो पं. सलिल भट्ट के पिता पं. विश्व मोहन भट्ट के घनिष्ठ मित्र थे। सात्विक वीणा के जनक पं. सलिल भट्ट ने अपनी अनूठी शैली और सधे हुए वादन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।


भट्ट संगीत परिवार की दसवीं पीढ़ी के प्रतिनिधि कलाकार पं. सलिल भट्ट भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने के लिए जाने जाते हैं। अपने चार दशक लंबे संगीत सफर में वह भारत के 600 से अधिक शहरों और 42 देशों में 2500 से अधिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुके हैं। उन्हें ‘तंत्री सम्राट’, ‘ग्लोबल इंडियन’ और ‘प्रिंस ऑफ रागा’ जैसी उपाधियों से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें प्रसार भारती और आकाशवाणी की ओर से ‘टॉप ग्रेड’ सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं।


कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पं. सलिल भट्ट और विद्यालय के प्रधानाचार्य आर.के. पांडेय द्वारा मां वीणापाणि के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। प्रस्तुति के बाद विद्यार्थियों ने कलाकार से संगीत से जुड़े प्रश्न पूछे। उनके उत्तर में पं. भट्ट ने कहा, “सुर ही संस्कार का आधार है और शिष्य को सदैव गुरु के बताए मार्ग पर चलना चाहिए।”


उन्होंने संगीत साधना में गुरु के मार्गदर्शन, अनुशासन और निरंतर अभ्यास के महत्व पर भी प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अंत में प्रधानाचार्य ने अतिथियों को स्मृति-चिह्न भेंट किए। स्पिकमैके की इस पहल ने विद्यार्थियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को समझने और देश की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर प्रदान किया।
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gc goyal rajan
  • अर्जुन रौतेला आगरा

    रंग लाती है हिना पत्थर से पिस जाने के बाद। सुर्ख रूह होता है इंसान ठोकरें खाने के बाद।। मेहंदी का रंग प्राप्त करने के लिए उसको पत्थर पर पिसा जाता है, तब लोग उसकी तरफ आकर्षित होते हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य जो जितना "दर्द अथवा कठिन कर्म" करता है, लोग उसी की तरफ आकर्षित होते हैं।

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