द्विशताब्दी वर्ष समारोह की श्रृंखला में गोस्वामी तुलसीदास एवं मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

अर्जुन रौतेला। आगरा कॉलेज, आगरा के द्विशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित विविध शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों की श्रृंखला में आज दिनांक 31 जुलाई 2025 को हिंदी विभाग, आगरा कॉलेज आगरा के तत्वावधान में गोस्वामी तुलसीदास एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

संगोष्ठी में समकालीन भारत के तीन प्रतिष्ठित विद्वानों ने साहित्य और समाज के अंतःसंबंधों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

प्रो. मनींद्रनाथ ठाकुर (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) ने तुलसीदास और प्रेमचंद के साहित्य के माध्यम से साहित्य और समाजविज्ञान के बीच संवाद की जटिलताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज और व्यक्ति के गत्यात्मक यथार्थ को उकेरता है तथा उसे नैतिक धारणाओं के साथ अभिव्यक्ति देता है। उन्होंने यह भी कहा कि आज साहित्यकार ही सामाजिक यथार्थ के साथ भविष्य की संभावनाओं को उजागर करने की क्षमता रखते हैं।

प्रो. आशुतोष कुमार (सम्पादक, आलोचना; हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने कहा कि तुलसीदास और प्रेमचंद अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाओं के संवेदनशील साक्षी थे। तुलसीदास ने रामराज्य के रूप में यूटोपिया का प्रतिपादन किया, जबकि प्रेमचंद यथार्थ से सीधे साक्षात्कार की ओर उन्मुख हुए। उन्होंने प्रेमचंद की कृतियों — प्रेमाश्रम, रंगभूमि और गोदान — में चित्रित किसानों के संघर्ष को आज के किसान आंदोलनों की पृष्ठभूमि में प्रासंगिक बताया।

प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय) ने कहा कि समाजशास्त्री साहित्य की अनुभूति को नहीं समझ सकते, क्योंकि साहित्य केवल तथ्य नहीं, बल्कि संवेदना का चित्रण है। उन्होंने तुलसीदास और प्रेमचंद की रचनाओं में स्त्री की स्वतंत्र इच्छा और पारिवारिक संरचना के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह दोनों रचनाकार स्त्री चेतना को साहित्य के केंद्र में लाने वाले युगप्रवर्तक हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. सुनीता रानी घोष ने की एवं संचालन प्रो. उमाकांत चौबे (संयोजक) द्वारा किया गया। प्रो. शेफाली चतुर्वेदी ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए उद्घाटन वक्तव्य दिया। अध्यक्षीय टिप्पणी में प्रो. घोष ने सभी वक्ताओं, शिक्षकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं उपस्थित संवाददाताओं के प्रति आभार प्रकट किया।

इस अवसर पर उप-प्राचार्य डॉ. पी. बी. झा, हिंदी विभाग के प्रो. वी. के. सिंह, प्रो. संध्या यादव, प्रो. सुनीता द्विवेदी, प्रो. रामपाल, प्रो. भूपाल सिंह, एसो. प्रो. शशिकांत, प्रो. धनंजय सिंह, अंग्रेजी विभाग प्रभारी प्रो. दीपक उपाध्याय, प्रो. संतोष कुमार सिंह, प्रो. शादा जाफ़री, डॉ. गौरव कौशिक, प्रो. प्रियम अंकित, दिनेश मौर्या, प्रो. नीरा शर्मा, प्रो. रचना सिंह, प्रो. पूनम चाँद, प्रो. आनंद प्रताप सिंह, प्रो. संजय शर्मा, प्रो. रीता निगम, प्रो. ऋजु निगम, प्रो. उमेश सहित अनेक विभागों के शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

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gc goyal rajan
  • अर्जुन रौतेला आगरा

    रंग लाती है हिना पत्थर से पिस जाने के बाद। सुर्ख रूह होता है इंसान ठोकरें खाने के बाद।। मेहंदी का रंग प्राप्त करने के लिए उसको पत्थर पर पिसा जाता है, तब लोग उसकी तरफ आकर्षित होते हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य जो जितना "दर्द अथवा कठिन कर्म" करता है, लोग उसी की तरफ आकर्षित होते हैं।

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