संवाददाता अर्जुन रौतेला। झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा के पास, वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया से मिली सूचना के बाद झारखंड वन विभाग ने एक मादा स्लॉथ भालू को बचाया, जिसकी उम्र लगभग 3-4 वर्ष है। प्रदर्शन दिखाने वाले भालुओं के क्रूर व्यापार से बचाई गई इस भालू को आगरा भालू संरक्षण केंद्र में वाइल्डलाइफ एसओएस की विशेषज्ञ देखरेख में सुरक्षित आश्रय दिया गया है।
झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा के पास साहिबगंज के शांत जंगलों में गश्त के दौरान वन अधिकारी ने एक आदमी को भालू को नचाते हुए देखा और तुरंत उच्च अधिकारियों को सूचित किया। इसके बाद वन विभाग की एक टीम मौके पर पहुंची और वहां एक परेशान मादा स्लॉथ भालू को देखा, जिसे उसका मालिक छोड़कर भाग गया था। संभवतः मनोरंजन के लिए भालुओं का इस्तेमाल करके पैसे कमाने वाले ‘डांसिंग’ व्यापार में उसका शोषण किया जा रहा था। भालू की नाज़ुक थूथन में भी छेद था।

हालांकि भालू को कोई चोट नहीं आई थी, लेकिन जब वन विभाग उसे सुरक्षित स्थान पर लाया, तो पाया गया की उसका पेट खराब था। तत्काल दीर्घकालिक पशु चिकित्सा सहायता की आवश्यकता को देखते हुए, झारखंड और उत्तर प्रदेश के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालकों से आवश्यक अनुमति प्राप्त करने के बाद भालू को वाइल्डलाइफ एसओएस की विशेषज्ञ देखरेख में आगरा भालू संरक्षण केंद्र में स्थानांतरित कर दिया गया। यहाँ इस भालू को ‘लिज़ी’ नाम दिया गया है, जिसको गर्म दलिया और तरबूज और सेब जैसे फल दिए जा रहे हैं, साथ ही जोड़ों के स्वास्थ्य के लिए कैल्शियम और पाचन शक्ति बढ़ाने वाले पूरक आहार भी दिए जा रहे हैं। इतने आघात से गुजरने के बावजूद, केंद्र में पहुँचने के कुछ ही समय बाद, उसे अपने बाड़े के अंदर बने चबूतरे और झूले से बेहद लगाव हो गया है।

साहिबगंज के डीएफओ, प्रबल गर्ग (आई.एफ.एस) ने बताया, “वन विभाग विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि ऐसी घटनाओं को प्रभावी ढंग से रोका जा सके और उन पर नियंत्रण पाया जा सके, जिससे वन्यजीव संरक्षण का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो सके। स्लॉथ भालू – वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में सूचीबद्ध हैं और किसी भी प्रकार का ऐसा शोषण एक गंभीर कानूनी अपराध है। उचित कार्रवाई के साथ-साथ, हम संवेदनशील क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि समुदायों को शिक्षित किया जा सके और इन भालुओं को अवैध और अमानवीय तरीके से रखने की प्रथा को ख़तम किया जा सके।”

वाइल्डलाइफ एसओएस की पशु-चिकित्सा सेवाओं के उप-निदेशक, डॉ. इलयाराजा ने बताया, “शुक्र है, फिलहाल थूथन पर रस्सी से हुए संक्रमण के कोई लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं। उसकी डीवॉर्मिंग की दवा शुरू कर दी गई है और पौष्टिक आहार के साथ-साथ हम उसे ऐसे खिलौने भी दे रहे हैं, जो उसे व्यस्त और एक्टिव रखते हैं।”

वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ, कार्तिक सत्यनारायण ने कहा, “यह जानकर बेहद खुशी होती है कि वाइल्डलाइफ एसओएस ने 30 साल पहले भारत की सड़कों से हर ‘डांसिंग’ स्लॉथ भालू को हटाने के मिशन के साथ अपना काम शुरू किया था और हम इसमें सफल भी हुए। इस तरह के एक अकेले मामले को देखकर हमें फिर से याद आता है कि हमने अपना काम क्यों शुरू किया था। हम भारत को इस क्रूर और बर्बर प्रथा से मुक्त रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
वाइल्डलाइफ एसओएस के डायरेक्टर कंज़रवेशन प्रोजेक्ट्स, बैजूराज एम.वी. ने कहा, “लिज़ी स्वभाव से चंचल है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उसने अपने देखभालकर्ता के साथ अच्छा रिश्ता बना लिया है। अब हम यह सुनिश्चित करेंगे कि उसे गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक चिकित्सा सहायता के साथ-साथ भरपूर प्यार और स्नेह मिलता रहे।”
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