पाकुड़ में ‘चॉइस नंबर’ का डिजिटल मकड़जाल: नागालैंड लॉटरी की आड़ में व्हाट्सएप पर चल रहा करोड़ों का काला खेल

सड़कों से सिमटकर मोबाइल की स्क्रीन तक पहुँचा मौत का जुआ; व्हाट्सएप पर तय हो रही पाकुड़ के युवाओं की किस्मत।

 सुमन कुमार दत्ता (पाकुड़ )

पाकुड़: जिले में अवैध लॉटरी का कारोबार अब पुराने ढर्रे को छोड़कर हाईटेक हो चुका है। पुलिस की आँखों में धूल झोंकने के लिए सट्टेबाजों ने अब सड़कों के बजाय मोबाइल को अपना नया अड्डा बना लिया है। पाकुड़ में इन दिनों ‘चॉइस नंबर’ का खेल महामारी की तरह फैल रहा है, जो नागालैंड और पश्चिम बंगाल की वैध लॉटरी की आड़ में खेला जा रहा है।

क्या है यह ‘चॉइस नंबर’ का गणित?

इस गोरखधंधे ने खुद को इतना आधुनिक बना लिया है कि इसे पकड़ना पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया है। इस खेल की कार्यप्रणाली कुछ इस तरह है:

  • नंबर का चयन: खिलाड़ी अपनी पसंद का कोई भी 5 अंकों का नंबर चुनते हैं, जिसे ‘चॉइस नंबर’ कहा जाता है।

  • व्हाट्सएप का इस्तेमाल: पसंद का नंबर एजेंटों को व्हाट्सएप पर भेजा जाता है।

  • डिजिटल पेमेंट: दांव की राशि का लेन-देन नकद के बजाय फोन-पे या गूगल-पे जैसे डिजिटल माध्यमों से किया जाता है।

बंगाल की लॉटरी और समय का चक्र

इस अवैध धंधे का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इसके परिणाम पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा संचालित आधिकारिक नागालैंड लॉटरी के नतीजों पर आधारित होते हैं। खेल का संचालन दिन में तीन बार किया जाता है:

  1. दोपहर 01:00 बजे

  2. शाम 06:00 बजे

  3. रात 08:00 बजे

जैसे ही आधिकारिक परिणाम घोषित होते हैं, व्हाट्सएप ग्रुप्स में हार-जीत का फैसला चंद सेकंड में हो जाता है। सट्टेबाज ‘डबल पैसे’ का लालच देकर दिहाड़ी मजदूरों और भोले-भाले युवाओं को इस दलदल में खींच रहे हैं।

सफेदपोश ‘मास्टरमाइंड’ का सिंडिकेट

सूत्रों की मानें तो पाकुड़ में इस पूरे नेटवर्क को एक संगठित गिरोह चला रहा है। गिरोह के सदस्य आम नागरिकों की तरह समाज में घुले-मिले रहते हैं, जिससे उनकी पहचान करना लगभग असंभव है। इस सिंडिकेट ने पुलिस से बचने के लिए कोई भी कागजी रिकॉर्ड (Physical Record) नहीं रखा है। सारा “कच्चा चिट्ठा” व्हाट्सएप चैट और डिलीट होने वाले संदेशों (Disappearing Messages) में छिपा होता है।

पुलिस के लिए तकनीकी चुनौती

पाकुड़ पुलिस के लिए यह डिजिटल सट्टा एक बड़ी चुनौती है। भौतिक सबूतों के अभाव में छापेमारी अक्सर विफल हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए पुलिस को पारंपरिक मुखबिरी के साथ-साथ डिजिटल सर्विलांस और व्हाट्सएप ट्रेल की सघन जांच करनी होगी।

विशेषज्ञ की राय: “यदि प्रशासन ने जल्द ही तकनीकी रणनीति नहीं अपनाई, तो पाकुड़ की युवा पीढ़ी इस डिजिटल जुए की भेंट चढ़ जाएगी। यह केवल पैसे का नुकसान नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक अपराध की जड़ है।”

अब देखना यह है कि पाकुड़ प्रशासन इस ‘अदृश्य’ सिंडिकेट के खिलाफ क्या कार्रवाई करता है और कब तक इस हाईटेक सट्टेबाजी पर लगाम लग पाती है।

 

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