गुजरात हेड राजेंद्र तिवारी की खास रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: स्वेच्छा से किया गया सेक्स वर्क अपराध नहीं, सेक्स वर्करों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने का निर्दश
देश की सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी वयस्क व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा से किया गया सेक्स वर्क (देह व्यापार) अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने पुलिस प्रशासन को निर्देश दिया है कि केवल सेक्स वर्क में संलग्न होने के आधार पर किसी व्यक्ति को परेशान, प्रताड़ित या गिरफ्तार न किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है। सेक्स वर्कर भी देश के नागरिक हैं और उन्हें भी समान रूप से कानून का संरक्षण और सम्मान प्राप्त होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से किया गया सेक्स वर्क और मानव तस्करी या जबरन देह व्यापार दो अलग-अलग विषय हैं, जिन्हें एक समान नहीं माना जा सकता।
न्यायालय ने पुलिस को चेतावनी देते हुए कहा कि सेक्स वर्करों के साथ अमानवीय व्यवहार, उत्पीड़न और भेदभावपूर्ण कार्रवाई उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। पुलिस को कानून की सीमाओं के भीतर रहकर कार्य करना चाहिए और किसी भी व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA) के तहत मानव तस्करी, जबरन देह व्यापार, वेश्यालय संचालन तथा सेक्स वर्करों की कमाई पर निर्भर रहने जैसी गतिविधियां अपराध हैं, लेकिन स्वेच्छा से किया गया सेक्स वर्क अपने आप में अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
यह निर्णय मानवाधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक बताया है।
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