अर्जुन रौतेला (नई दिल्ली) । दीपावली का पर्व खुशियों और रोशनी का संदेश लेकर आता है, लेकिन त्योहार के बाद दिल्ली-NCR सहित आसपास के क्षेत्रों में बढ़ता वायु प्रदूषण जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। पटाखों का धुआँ, वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल, औद्योगिक प्रदूषण और पराली जलाने जैसी गतिविधियां मिलकर वातावरण को विषाक्त बना रही हैं। नवंबर की शुरुआत में ही राजधानी दिल्ली की वायु गुणवत्ता बेहद खराब स्तर पर पहुंच गई। 3 नवंबर को दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 331 दर्ज किया गया, जो अत्यंत खराब श्रेणी में आता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर फेफड़ों को प्रभावित कर सकते हैं। इनके लगातार संपर्क में रहने से खांसी, गले में जलन, सांस लेने में परेशानी, अस्थमा और फेफड़ों से संबंधित पुरानी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों का जोखिम भी बढ़ता है।

बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से अस्थमा, हृदय रोग अथवा फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित लोगों को प्रदूषित वातावरण में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। बच्चों के विकसित होते फेफड़ों पर प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। वहीं बुजुर्गों और पुरानी बीमारियों से ग्रस्त लोगों की परेशानी बढ़ सकती है।
विश्व स्वास्थ्य से जुड़े अध्ययनों के अनुसार, वायु प्रदूषण वैश्विक स्तर पर मृत्यु और गंभीर बीमारियों का एक बड़ा कारण बन चुका है। स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2021 में दुनिया भर में लगभग 81 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं। यह आंकड़ा इस समस्या की गंभीरता को स्पष्ट करता है।

बढ़ते प्रदूषण के बीच निवारक स्वास्थ्य देखभाल और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण का महत्व बढ़ गया है। चिकित्सकीय सलाह के अनुसार सीबीसी, रक्त शर्करा, एचबीए1सी और लिपिड प्रोफाइल जैसी जांचें सामान्य स्वास्थ्य स्थिति और अन्य जोखिम कारकों का आकलन करने में सहायक हो सकती हैं। लगातार खांसी, सांस फूलने अथवा सीने में जकड़न की शिकायत होने पर चिकित्सक की सलाह से स्पाइरोमेट्री और फेफड़ों की कार्यक्षमता संबंधी जांच कराई जा सकती है। हालांकि, सामान्य रक्त जांच से अकेले फेफड़ों पर प्रदूषण के प्रभाव का पता नहीं लगाया जा सकता।

स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए लोगों को घर से निकलने से पहले वायु गुणवत्ता सूचकांक की जानकारी लेनी चाहिए। हवा अधिक प्रदूषित होने पर खुले स्थानों में भारी व्यायाम और लंबे समय तक रहने से बचना चाहिए। आवश्यक होने पर अच्छी गुणवत्ता वाला एन-95 या समकक्ष मास्क उपयोग करना लाभकारी हो सकता है। घरों में धूम्रपान और धुएं के अन्य स्रोतों से दूरी बनाए रखने के साथ अस्थमा एवं हृदय रोग से पीड़ित लोगों को निर्धारित दवाओं का नियमित सेवन करना चाहिए।
इस दिशा में केवल व्यक्तिगत सावधानी ही पर्याप्त नहीं है। सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, कचरा जलाने पर रोक और कृषि में स्वच्छ विकल्पों को अपनाना भी आवश्यक है।

बायोसिटी हेल्थकेयर ने दिया निवारक स्वास्थ्य देखभाल पर जोर
दिल्ली की अग्रणी जांच प्रयोगशाला बायोसिटी हेल्थकेयर भी बढ़ते प्रदूषण के बीच स्वास्थ्य जागरूकता, समय पर बीमारी की पहचान और विश्वसनीय जांच सेवाओं के महत्व को रेखांकित कर रही है। संस्थान के सह-संस्थापक शुभम जैन के अनुसार, बेहतर स्वास्थ्य के लिए जागरूकता और समय पर जांच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बीमारी के लक्षण सामने आने की प्रतीक्षा करने के बजाय नियमित स्वास्थ्य देखभाल को जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहिए।

दिवाली की रोशनी के साथ स्वच्छ हवा और स्वस्थ जीवन का संकल्प लेना भी समय की आवश्यकता है। प्रदूषण से मुकाबला सरकार, प्रशासन और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। आखिरकार, स्वस्थ शरीर और स्वच्छ वातावरण ही त्योहारों की खुशियों को वास्तविक अर्थ प्रदान कर सकते हैं।
अन्य खबरों हेतु संपर्क करें संवाददाता अर्जुन रौतेला 8868868461
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