राजनीति में बदलाव, आगरा को मिले 2 सांसद

*आगरा को मिल गए दो और सांसद, नवीन जैन और रामजीलाल सुमन राज्यसभा के लिए निर्वाचित*

 

आगरा जिले को आज दो और सांसद मिल गए। भारतीय जनता पार्टी के नवीन जैन और समाजवादी पार्टी के रामजीलाल सुमन ने राज्यसभा के चुनावों में जीत हासिल कर ली है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार को राज्यसभा की सीटों के लिए हुए मतदान में उत्तर प्रदेश से भाजपा ने आठ सीटों पर विजय प्राप्त की, जबकि सपा ने दो सीटें जीतने में सफलता पाई। भाजपा की सात सीटों पर स्पष्ट जीत मानी जा रही थी। बाद में मैदान में उतारे गए संजय सेठ के रूप में भाजपा के आठवें प्रत्याशी विजयी रहे और इस कारण सपा के आलोक रंजन को हार का सामना करना पड़ा। आलोक रंजन सेवानिवृत आईएएस हैं। वे आगरा में जिलाधिकारी रह चुके हैं।

 

*वर्ष 1989 से राजनीति में सक्रिय हैं नवीन जैन*

 

आरएसएस के स्वयंसेवक से अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत करने वाले नवीन जैन ने वर्ष 1989 में राजनीति में कदम रखा। उन्होंने पार्षद का चुनाव लड़ा था। इसके बाद डिप्टी मेयर और मेयर तक का सफर तय किया। संगठनात्मक भी उनकी पकड़ मजबूत रही और ब्रजक्षेत्र के साथ ही वह प्रदेश में सहकोषाध्यक्ष बने।

पूर्व प्रदेश महामंत्री संगठन राकेश जैन से लेकर सुनील बंसल तक के नजदीकी कहे जाने नवीन जैन की शीर्ष नेतृत्व तक मजबूत पकड़ रही है। वर्ष 2017 में मेयर चुने जाने के बाद उन्होंने ऑल इंडिया मेयर काउंसिल के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। राज्यसभा के लिए पार्टी ने उनके नाम की घोषणा अल्पसंख्यक कोटे से की थी।

 

 

*26 वर्ष की आयु में सांसद बन गए थे रामजीलाल सुमन*

 

मूल रूप से सादाबाद के गांव बहरदोई निवासी रामजीलाल सुमन 26 वर्ष की आयु में वर्ष 1977 में फिरोजाबाद से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए थे। सपा से फिरोजाबाद से वह वर्ष 1977, 1989, 1999 और 2004 में चार बार सांसद रहे। चंद्रशेखर की सरकार में वर्ष 1991 में वह श्रम और बाल विकास मंत्री भी रहे। सपा ने वर्ष 2014 और 2019 में उन्हें हाथरस लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया था, लेकिन जीत नहीं सके। सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामजीलाल सुमन बेबाकी के लिए जाने जाते हैं। सुमन की राजनीति में ऊंचाई छूने की चर्चाएं छात्र राजनीति से ही होने लगी थीं। हाथरस में वर्ष 1971 में एमजी पालीटेक्निक के छात्र रवेंद्र और बंटी की हत्या के बाद बड़ा आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन का नेतृत्व रामजी लाल सुमन ने ही किया था। इस आंदोलन से उनकी राजनीतिक पारी को रफ्तार मिली।

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