गुजरात हेड राजेंद्र तिवारी कि खास रिपोर्ट
गुजरात हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला – BNSS की धारा 223(2) के तहत पुलिस अधिकारियों को मिला कानूनी संरक्षण
गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए “भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)” की नई धारा 223(2) के प्रावधानों को स्पष्ट किया है, जिसके तहत पुलिस अधिकारियों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है।
मामले के अनुसार, सूरत में एक आरोपित द्वारा शिकायत दर्ज कराते हुए डीसीपी राजदीपसिंह नखुम और पीआई आर. जी. गोजिया पर शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे। इस शिकायत के आधार पर सूरत मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 13 जून 2024 को अधिकारियों के विरुद्ध बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज करने का आदेश दिया था।
इस आदेश को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जहां न्यायमूर्ति गीता गोपी की अदालत में मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ए. डी. नानावटी द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि बिना संबंधित अधिकारियों को सुने सीधे कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 223(2) के अनुसार, यदि कोई पुलिस अधिकारी अपनी आधिकारिक ड्यूटी के दौरान कार्य कर रहा हो, तो उसके खिलाफ कोई भी आपराधिक कार्रवाई शुरू करने से पहले संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर देना अनिवार्य है।
अदालत ने “राइट टू बी हर्ड” (सुनवाई का अधिकार) को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत है और इसका पालन हर स्थिति में आवश्यक है। इस मामले में यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी।
हाईकोर्ट ने सूरत मजिस्ट्रेट के आदेश को निरस्त करते हुए पुनः विचार करने के निर्देश दिए हैं और स्पष्ट किया है कि भविष्य में ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों को सुने बिना कार्रवाई नहीं की जा सकती।
यह निर्णय पुलिस तंत्र में कार्यरत अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है और भविष्य में इस प्रकार के मामलों में कानूनी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और संतुलित बनाने में सहायक सिद्ध होगा।
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