अर्जुन रौतेला आगरा, उत्तर प्रदेश: ग्वालियर, मध्य प्रदेश की तेजाब पीड़िता तराना की इलाज के दौरान मृत्यु पर शिरोज़ हैंगआउट कैफे, आगरा में शोक सभा एवं कैंडल मार्च का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, एसिड अटैक सर्वाइवर्स और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

तराना, जो कम्पू, ग्वालियर की निवासी थीं, पर 7 नवम्बर की शाम करीब 6 बजे उनके जेठ मुसीर खान ने घर में घुसकर तेजाब से हमला किया था। लगभग 11 माह पूर्व उनके पति बबलू खान का बीमारी के चलते निधन हो चुका था। पति की मृत्यु के बाद आरोपी द्वारा लगातार की जा रही छेड़छाड़ का विरोध करने पर यह हमला किया गया, जो घरेलू हिंसा और लैंगिक आधारित हिंसा की भयावह सच्चाई को उजागर करता है।
हमले के बाद पड़ोसियों की मदद से तराना को तुरंत जिला अस्पताल, ग्वालियर में भर्ती कराया गया। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। घटना की जानकारी मिलते ही 11 नवम्बर को छांव फाउंडेशन की टीम ग्वालियर पहुँची, जहाँ यह स्पष्ट था कि प्राथमिक उपचार के बावजूद पीड़िता का चेहरा, आँखें, हाथ और पैर गंभीर रूप से झुलस चुके थे तथा गहरे संक्रमण का खतरा लगातार बढ़ रहा था।
छांव फाउंडेशन, जो पिछले एक दशक से अधिक समय से तेजाब पीड़ितों के इलाज और पुनर्वास पर कार्य कर रहा है, लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि एसिड अटैक के मामलों में केवल शुरुआती इलाज पर्याप्त नहीं होता। एसिड शरीर के भीतर गहरे ऊतकों और अंगों को नुकसान पहुँचाता है, जिससे संक्रमण, जटिलताएँ और जान का जोखिम लंबे समय तक बना रहता है। ऐसे मामलों में विशेषज्ञ इलाज, इंफेक्शन कंट्रोल और स्वच्छ वातावरण अनिवार्य है।

मध्य प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए किसी समर्पित, प्रभावी और समन्वित रिस्पॉन्स सिस्टम के अभाव में तराना जैसे मामलों में समय पर उच्च-गुणवत्ता इलाज तक पहुँच बेहद कठिन हो जाती है। इस स्थिति को देखते हुए छांव फाउंडेशन ने हस्तक्षेप कर तराना को एम्स, दिल्ली स्थानांतरित कराया, जहाँ उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई। हालांकि तब तक संक्रमण अत्यधिक बढ़ चुका था और 4 जनवरी को इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

स्टॉप एसिड अटैक्स और छांव फाउंडेशन का मानना है कि यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य, न्याय और शासन तंत्र की गंभीर विफलता को दर्शाती है। एसिड अटैक केवल शारीरिक हमला नहीं होता, बल्कि यह पीड़ित को लंबे इलाज, सामाजिक बहिष्कार और जीवन भर के मानसिक आघात की सजा देता है। आधिकारिक आँकड़े भी बताते हैं कि 2017 से 2021 के बीच देश में सैकड़ों एसिड अटैक मामले दर्ज हुए, जिनमें से कई आज भी जाँच और ट्रायल के स्तर पर लंबित हैं।

इसी पृष्ठभूमि में स्टॉप एसिड अटैक्स और छांव फाउंडेशन ने केंद्र एवं राज्य सरकारों से मांग की कि एसिड अटैक मामलों के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर एक डेडिकेटेड टास्क फोर्स का गठन किया जाए। यह टास्क फोर्स पहले अस्पताल में भर्ती से लेकर उच्च गुणवत्ता वाले बर्न ट्रीटमेंट, इंफेक्शन कंट्रोल, रिहैबिलिटेशन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और मुआवजा वितरण तक एक एकीकृत, जवाबदेह और समयबद्ध ढांचा सुनिश्चित करे।
इसी क्रम में महिला शांति सेना की अध्यक्ष वत्सला प्रभाकर ने कहा कि एसिड अटैक जैसी घटनाओं की रोकथाम के लिए समाज में व्यापक जागरूकता फैलाना भी उतना ही आवश्यक है, जिसके लिए एक प्रभावी टास्क फोर्स का गठन किया जाना चाहिए। वहीं सिविल सोसायटी ऑफ आगरा से अनिल शर्मा ने शासन–प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित कर गैर-कानूनी रूप से हो रही एसिड की बिक्री पर सख्ती से रोक लगाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
शोक सभा को संबोधित करते हुए छांव फाउंडेशन के डायरेक्टर आशीष शुक्ला ने कहा कि पॉइजन एक्ट, 1919 के तहत बने मॉडल पॉइजन रूल्स और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद देश भर में एसिड की खुलेआम बिक्री जारी है, जो कानून के कमजोर क्रियान्वयन को दर्शाता है। उन्होंने मांग की कि एसिड की खुदरा बिक्री पर सख्त प्रतिबंध, मजबूत लाइसेंसिंग व्यवस्था और नियमित मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए। साथ ही उन्होंने एसिड अटैक मृत्यु मुआवज़े की राशि को वर्तमान न्यूनतम 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये किए जाने की भी मांग की, ताकि पीड़ित परिवारों के लिए वास्तविक न्याय और पुनर्वास संभव हो सके।

आशीष शुक्ला ने यह भी कहा कि अदालतों और सरकारी योजनाओं में एसिड अटैक मामलों को एक अलग श्रेणी के रूप में चिन्हित किया जाना चाहिए, जहाँ त्वरित मुआवज़ा, मुफ्त एवं समयबद्ध इलाज तथा आजीविका के अवसरों को कानूनी रूप से सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि जब तक एसिड की उपलब्धता, कमजोर कानूनी लागूकरण और अपर्याप्त मुआवज़ा संरचना में ठोस सुधार नहीं होता, तब तक ‘ज़ीरो टॉलरेन्स’ जैसे शब्द केवल कागज़ों तक सीमित रहेंगे।

शोक सभा के दौरान प्रोफेसर सुमिता डोडिया, एडवोकेट नरेश पारस, वरिष्ठ पत्रकार महेश धाकड़, महिला अधिकारों पर काम करने वाली रोमी चौहान, मालती कुशवाह, सृजन फाउंडेशन से अदिति कात्यायन, मन्नु शर्मा, अजय तोमर, एक्सेज डेवलपमेंट सर्विसेज से दिनेश सुथार, निधि जैन तथा शीरोज़ कैफे से माननी, रुकैया, डॉली, सुधा और सना ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर तराना को श्रद्धांजलि दी और मोमबत्तियाँ जलाकर यह संकल्प लिया कि एसिड अटैक सर्वाइवर्स के सम्मान, न्याय और एक मजबूत रिस्पॉन्स सिस्टम के लिए संघर्ष को और अधिक संगठित एवं तेज़ किया जाएगा। कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वय रामभरत उपाध्याय तथा सत्यम शुक्ला द्वारा किया गया।
अन्य खबरों हेतु संपर्क करें संवाददाता अर्जुन रौतेला 8868868461
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