गुजरात में राजनीतिक अनुभव के सामने पढ़ाई लिखाई हुई फेल

०५/१२ /२०२५

टी यन न्यूज 24 गुजरात हेड राजेंद्र तिवारी की कलम से

आज के समय गुजरात में भले ही गोपाल इटालियाऔर जिग्नेश मेवाणी ने LLB किया हो, लेकिन हर्ष संघवी ने राजनीति में PhD की है

सिर्फ़ 15 वर्ष की उम्र में राजनीति में कदम रखने वाले इस युवा नेता ने अपनी मेहनत और मजबूत संकल्प से साबित कर दिया है कि उम्र नहीं, बल्कि ऊँचे इरादे मायने रखते हैं। आज गुजरात के शीर्ष नेताओं में गिने जाने वाले डिप्टी सीएम हर्ष संघवी को विपक्ष भले ही “आठवीं पास” कहकर मज़ाक उड़ाए, लेकिन याद रहें यही युवा नेता गुजरात का भविष्य हैं।

यह ऐसे व्यक्ति हैं जिनके काम की धाक है। विपक्ष की कितनी भी आंधी चली हो, इस “आठवीं पास” नेता ने उसे मोड़कर रख दिया है। LLB करने वाले कुछ नेता यह भूल जाते हैं कि वे कानून के विशेषज्ञ भले हों, लेकिन गुजरात के आठवीं पास डिप्टी सीएम ने राजनीति में PhD कर रखी है। खाकी की पट्टियाँ उतरें या न उतरें, विपक्ष को किसान मुद्दे से हटाने में उनकी राजनीतिक चतुराई काम कर गई।

*बेमौसम बारिश से 43 लाख हेक्टेयर में फसल नुकसान के बाद सरकार घिरी**

गुजरात में बेमौसम बारिश से 43 लाख हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ, जिससे भूपेंद्र पटेल सरकार कुछ दिन पहले बुरी तरह घिर गई थी। किसानों और फसल नुकसान का मुद्दा सरकार के लिए दुखती नस बन गया था। सरकार ने 10 हजार करोड़ रुपये का ऐतिहासिक पैकेज घोषित किया, फिर भी किसान संतुष्ट नहीं हुए। कर्ज माफी और मुआवज़े के मुद्दे पर सरकार ऐसे फँसी कि हर सुबह नए संकट खड़े हो जाते थे, और सरकार उन्हें संभाल नहीं पा रही थी। दिल्ली तक से गुजरात को फटकार सुननी पड़ी।

गुजरात में 55 लाख किसान हैं। अगर किसान मुद्दा सरकार के हाथ से निकल जाता, तो नगर निकाय चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस इसे ज़ोर-शोर से उठाती। दिल्ली से आए केजरीवाल ने भी इस मुद्दे पर गुजरात में सभाएँ कीं और सरकार पर हमला बोला। कांग्रेस ने भी “जन संघर्ष यात्रा” की घोषणा कर दी। सरकार की स्थिति ऐसी बन गई थी जैसे “आप और कांग्रेस के बीच सूप जैसी हालत” हो गई हो। 10 हजार करोड़ के पैकेज के बावजूद किसान मानने को तैयार नहीं थे।

कांग्रेस की यात्रा शुरू होने से ठीक पहले हर्ष संघवी ने ऐसा दांव खेला कि विपक्ष किसान मुद्दे से हट गया।

किसानों का पैकेज बनाम संघवी की ‘टूलकिट’**

विपक्ष को अहम मुद्दों से हटाने में डिप्टी सीएम हर्ष संघवी और सरकार सफल रही। जिग्नेश मेवाणी के बयान के अगले ही दिन डिप्टी सीएम ने बिना नाम लिए “पट्टा उतारने” के बयान पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। इसके बाद कांग्रेस की जन आक्रोश यात्रा किसान मुद्दे से भटककर शराब के ट्रैक पर चढ़ गई। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों ही हर्ष संघवी और शराब का ही राग अलापने लगे।

सरकार और भाजपा चाहती थी कि विपक्ष किसान मुद्दे से हटकर किसी और विषय में उलझ जाए — और वही हुआ। पुलिस प्रमुख विकास सहाय ने भी बिना नाम लिए “पट्टा उतारने” की घटना को आगे बढ़ाया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष जगदीश विश्वकर्मा ने भी शराब और पट्टा उतारने पर बयान देकर कांग्रेस और आप को इसी मुद्दे में उलझा दिया।

इस पूरी “टूलकिट” के सूत्रधार हर्ष संघवी रहे। पार्टी, सरकार और पुलिस तंत्र ने इस रणनीति को लागू किया और किसान मुद्दा हाशिए पर चला गया। जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ पुलिस परिवारों के विरोध के बाद कांग्रेस और मेवाणी बौखला गए। जगह-जगह रैलियाँ निकाली गईं, जिला स्तर तक ज्ञापन दिए गए। आप के विधायक गोपाल इटालिया और प्रदेश अध्यक्ष इसुदान गढ़वी भी हर्ष संघवी और शराब पर हमला बोलने उतर पड़े।

कांग्रेस का आंतरिक संघर्ष: मेवाणी की आक्रामकता, अन्य नेताओं की चुप्पी**

विपक्ष का डायवर्जन: किसान भूले, शराब-जुआ बने मुख्य मुद्दे**

सबसे बड़ी बात यह रही कि जिग्नेश मेवाणी ने इस मामले को आत्मसम्मान का मुद्दा बना लिया और सोशल मीडिया पर आक्रामक हो गए। उनके समर्थक भी जुड़ गए और सरकार की बनाई रणनीति में कांग्रेस फँस गई। अब कांग्रेस की जन संघर्ष यात्रा में शराब, जुआ और ड्रग्स ने किसानों को पूरी तरह साइडलाइन कर दिया और जनता के असली मुद्दे पीछे छूट गए।

कांग्रेस की जन संघर्ष यात्रा पर मेवाणी का कब्ज़ा**अब स्थिति यह है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी लगने लगा है कि वे खुद मेवाणी को बड़ा बना रहे हैं। कांग्रेस ने जिन मुद्दों को लेकर यात्रा निकाली थी, वे भुला दिए गए और शराब-जुआ ही मुख्य एजेंडा बन गया। गुजरात में बच्चा-बच्चा जानता है कि शराबबंदी सिर्फ नाम की है, शराब आसानी से मिलती भी है और पकड़ी भी जाती है।

 

कांग्रेस को लगा कि उसने गुजरातियों की दुखती नस पकड़ ली है, इसलिए राज्यभर के नेता बयान देने लगे। हर्ष संघवी और भाजपा नेता चाहते थे कि कांग्रेस भटके — और वे इसमें सफल भी हो गए।

शैक्षणिक तानों के विरुद्ध राजनीतिक बुद्धि**

कांग्रेस ने शराब-जुए का मुद्दा भुनाया, और आम आदमी पार्टी भी उसमें कूद पड़ी। इसुदान गढ़वी से लेकर गोपाल इटालिया तक सभी हर्ष संघवी और सरकार पर हमले करने लगे और किसानों को भूल गए। सरकार की “सेफ गेम” में आप भी फँस गई।

इससे यह साबित हो गया कि किताबों का ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभव ज्यादा बड़ा होता है। गोपाल इटालिया और जिग्नेश मेवाणी भले ही LLB करके कानून के जानकार बन गए हों, लेकिन वे यह न भूलें कि हर्ष संघवी ने राजनीति में पीएचडी कर ली है।

हर्ष संघवी छोटी उम्र से ही राजनीति में सक्रिय रहे हैं और आज गुजरात सरकार में महत्वपूर्ण पद पर पहुँचे हैं। वे सिर्फ मंत्री नहीं, बल्कि जनता के सेवक हैं। सूरत की मजुरा सीट के विधायक के रूप में वे हमेशा जनता के बीच रहकर समस्याओं के समाधान को अपनी प्राथमिकता मानते हैं।

BJP युवा मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष से लेकर गुजरात के सबसे युवा गृह मंत्री (वर्तमान में डिप्टी सीएम) बनने तक का उनका सफर उनकी असाधारण क्षमता को दर्शाता है। वे मानते हैं कि पुरानी सोच नहीं, बल्कि तकनीक और आधुनिक विचारों से ही समस्याओं का समाधान संभव है।

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