संवादाता अर्जुन रौतेला आगरा। ब्रजभाषा एवं हिन्दी साहित्य को समर्पित देश की ख्यातिलब्ध संस्था ब्रजभाषा काव्य मंच,आगरा के तत्वावधान में सरस्वती शिशु मंदिर,दीनदयाल नगर में एक वृहद कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें पूरे ब्रज मंडल के प्रख्यात कवि व कवयित्रियों ने काव्य की ऐसी रसधार बहायी कि पूरा प्रांगण तालियों एवं वाह-वाह से गुंजायमान होता रहा।
कवि सम्मेलन का श्रीगणेश माँ शारदे के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ मधुर कंठ की धनी कवयित्री रेणु उपाध्याय की वाणी वंदना से हुआ। मथुरा के कवि रूपेश धनगर ने जाम के झाम पर कटाक्ष करते हुए अपनी रचना ‘सुनौ भाई मैं मथुरा कौ जाम’ सुनाई। मथुरा की ही डाॅ. नीतू गोस्वामी ने ‘सूर बाबा बड़ौ निरालौ ऐ’ सुनाकर सबकी तालियां बटोरीं। मुरसान हाथरस से पधारे हास्य कवि सबरस मुरसानी ने आज के राजनीतिज्ञों पर करारा व्यंग्य कसा ‘नेताजी हमसे करौ न हाँसी ठठ्ठा’, आचार्य निर्मल ने ब्रजभाषा में मां भारती की वंदना की ‘मां भारती हमारी की शान कूं नमन ऐ’ और कवि अनिल शर्मा ‘अनल’ ने ‘जै जै जै जै हिन्दुस्तान तेरी सिगते ऊंची सान’ सुनाकर सम्मेलन में राष्ट्रप्रेम का संचार कर भारत माता की जय का उद्घोष कराया। टूण्डला से पधारे कवि प्रणव कुलश्रेष्ठ ने गरमी पर केन्द्रित लोकगीत ‘पिया ऐसी गरमी में न लै जाऔ ससुराल’ सुनाया।

कवयित्री गंगा रानी चतुर्वेदी ने आज की व्यवस्था पर तंज कसते हुए अपनी रचना ‘वो दौर नहीं है अब कि शिकायतें की जाएं’ सुनाकर श्रोताओं की खूब वाहवाही लूटी। सजल विधा के संवाहक इं. संतोष सिंह ने ‘रोते हुओं को मैं हंसाऊं क्या बुरा है, रूठे हुओं को मैं मनाऊं क्या बुरा है’ सजल सुनाकर कार्यक्रम को ऊंचाइयां प्रदान कीं। छाता से पधारे रामदेव राही ने ‘घनस्याम सौं जाय कें बोली घटा बहते बहते बहते नैना’ सुनाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। डाॅ. राजीव पांडेय के गीत ‘मैं दिए की रोशनी हूं आंधियों से कब डरी हूं’ ने सकारात्मकता का संचरण किया। ब्रजभाषा काव्य मंच के संस्थापक व अध्यक्ष डाॅ. रामेन्द्र शर्मा ‘रवि’ ने ब्रजभाषा को विश्वपटल पर स्थापित होने के मनोभाव से ब्रजभासा में कुण्डलियां सुनाकर श्रोताओं का खूब स्नेह बटोरा। राजपुर के कवि राकेश शर्मा ने ‘राधारानी नै मोकूं खूब सतायौ’ सुनाकर राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों को शब्दों में उकेरा। आगरा की कवयित्री वंदना तिवारी ने अपनी मधुर आवाज में गीत की प्रस्तुति दी। कवि अंजीव ने प्रस्तुतीकरण की अपनी विशेष शैली से सबका मन मोह लिया।

आगरा के हास्य कवि डाॅ. हृदेश कुलश्रेष्ठ एडवोकेट ने अपनी रचनाओं से सभी को हँसाकर लोटपोट कर दिया। आचार्य उमाशंकर पाराशर ने राधा-कृष्ण के सौ वर्षों से अधिक के प्रेम व बिछोह को अपनी रचना में पिरोकर सम्मेलन को ऊंचाई पर पहुंचाया। मथुरा के रविन्द्र पाल रसिक ने अपने सुमधुर कंठ से ‘जिनके घर में बबूलों के बागान थे वो गुलाबों के गमले सजाने लगे’ सुनाया।कवि जितेन्द्र विमल के छन्दों को खूब सराहा गया। ब्रजभाषा के मूर्धन्य कवि देवी प्रसाद गौड़ ने कवि सम्मेलन में संचालक की मजबूरी व्यक्त करता व्यंग पढ़ा। एटा से पधारे डाॅ. उदयवीर सिंह ने अपनी छोटी सी रचना ‘कदम-कदम मिलाता जाए’ से गागर में सागर भर दिया। वात्सल्य ग्राम वृन्दावन से पधारे डाॅ. उमाशंकर राही ने ‘मुस्कराने के लिए एक बहाना चाहता हूं हर कदम को मील का पत्थर बनाना चाहता हूं’ सुनाकर श्रोताओं को बार-बार तालियां बजाने को मजबूर कर दिया।

विशिष्ट अतिथि के रूप में वृन्दावन से पधारे ब्रजभाषा के वरिष्ठ कवि मोहन लाल मोही ने बहुत ही चुटीले अंदाज में अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे गोवर्धन के वरिष्ठ कवि हरिबाबू ओम ने अपनी रचनाओं के साथ-साथ ब्रजभाषा काव्य मंच को इस भव्य आयोजन के लिए साधुवाद दिया। काव्य-पाठ करने वालों में नीरज वर्मा, राहुल ब्रजवासी, अनुज अनुभव, पंकज प्रजापति एवं राकेश पाठक भी शामिल रहे।
कवि सम्मेलन का खूबसूरत संचालन आचार्य निर्मल ने किया एवं डाॅ. रामेन्द्र शर्मा रवि ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
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