108 बुजुर्गों का सम्मान कर बच्चों ने सीखे संस्कार, दादा-दादी और नाना-नानी के चेहरे खिले

अर्जुन रौतेला आगरा। यमुना ब्रिज स्थित श्याम लाल सरस्वती शिशु-विद्या मंदिर में 9 अक्टूबर को दादा-दादी एवं नाना-नानी सम्मान समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में 108 बुजुर्ग अभिभावकों का सम्मान कर बच्चों में बड़ों के प्रति श्रद्धा, आदर और संस्कारों की भावना जागृत की गई।

कार्यक्रम का शुभारंभ पूर्व संभाग निरीक्षक शैलेंद्र कुमार दुबे और विवेकानंद नगर के सरसंघचालक ओम प्रकाश शर्मा ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्पार्चन कर किया। समारोह में उपस्थित बुजुर्गों को मंच पर बैठाकर नन्हे-मुन्ने बच्चों ने माला पहनाकर सम्मानित किया। बच्चों के इस स्नेहपूर्ण व्यवहार से बुजुर्ग भावविभोर हो उठे।

मुख्य वक्ता ओम प्रकाश शर्मा ने कहा कि बुजुर्गों से मिलने वाली शिक्षा और जीवन के अनुभव अनमोल होते हैं। जो सीख अपने वृद्धजनों से मिलती है, वह दुनिया की कोई किताब नहीं सिखा सकती। उन्होंने बच्चों को अपने दादा-दादी और नाना-नानी का आदर करने तथा उनके अनुभवों से सीख लेने की प्रेरणा दी।

पूर्व संभाग निरीक्षक शैलेंद्र कुमार दुबे ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि यह पहल परिवारों को एकजुट रखने और युवा पीढ़ी को संस्कारों की दिशा देने का सराहनीय प्रयास है। ऐसे आयोजनों से बच्चों में अपने परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के प्रति सम्मान और आत्मीयता बढ़ती है।

समारोह में धार्मिक प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। इसमें विजेता रहे दादा-दादी और नाना-नानी को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। विद्यालय के प्रधानाचार्य उत्तम सिंह ने कार्यक्रम को शिक्षा का अनूठा प्रयोग बताते हुए कहा कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए किताबी ज्ञान के साथ संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों की शिक्षा भी आवश्यक है।

इस अवसर पर विद्यालय के प्रबंधक संजीव कुमार दौनेरिया, कोषाध्यक्ष आर.पी. गोयल, पत्रकार वरुण कौशिक सहित अन्य सम्मानित पदाधिकारी एवं अभिभावक उपस्थित रहे। प्रधानाचार्य उत्तम सिंह ने सभी अतिथियों और अभिभावकों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के अंत में सभी के लिए जलपान की व्यवस्था की गई।

अन्य खबरों हेतु संपर्क करें संवाददाता अर्जुन रौतेला 8868868461

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  • अर्जुन रौतेला आगरा

    रंग लाती है हिना पत्थर से पिस जाने के बाद। सुर्ख रूह होता है इंसान ठोकरें खाने के बाद।। मेहंदी का रंग प्राप्त करने के लिए उसको पत्थर पर पिसा जाता है, तब लोग उसकी तरफ आकर्षित होते हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य जो जितना "दर्द अथवा कठिन कर्म" करता है, लोग उसी की तरफ आकर्षित होते हैं।

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