फतेहपुर सीकरी दरगाह हज़रत शैख़ सलीम चिश्ती के सज़्ज़ादानशी अरशद फरीदी के नेतृत्व में चेहल्लुम की महफिल का अहतमाम किया गया महफ़िल में तमाम शायर व ओलेमा ने कलाम पेश किया। बाद महफ़िल खिचड़े का लंगर तकसीम किया गया।
चहल्लुम हजरत इमाम हुसैन की शहादत के चालीसवें दिन मनाया जाने वाला श्रद्धा का धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें मजलिस,लंगर,शबील शामिल होते हैं।

यह दिन एक सबक़ है — कि सच्चाई के रास्ते पर चलना मुश्किल जरूर होता है, लेकिन वही इंसानियत का रास्ता है।इस दिन लोग अपने-अपने शहर की कर्बला की ज़ियारत को जाते हैं। घर-घर नज़र होती है — लंगर, सबील, शरबत, खिचड़ा और तबर्रूक तकसीम किया जाता है। आँखें नम होती हैं, मन्नतें पूरी होने पर लोग शुक्र अदा करते हैं। मजलिसों में इमाम हुसैन अ.स. के जीवन और कर्बला की हकीकत पर रोशनी डाली जाती है।
उलेमा और मौलाना मजलिस को खिताब करते हैं, जिसमें कर्बला के शहीदों की कुर्बानियों को याद किया जाता है। अजादार नम आंखों से नौहाख्वानी और मर्सिया पढ़ते हैं, और इमाम हुसैन के संदेश को दोहराते हैं।
भारत से लेकर इराक, ईरान, पाकिस्तान, लेबनान, नाइजीरिया, अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और पूरे यूरोप तक – मोहर्रम को इंसानियत की सबसे बड़ी कुर्बानी के रूप में याद किया जाता है।
इमाम हुसैन अ.स. का पैग़ाम “अगर सामने जुल्म है, तो खामोशी गुनाह है।”
इमाम हुसैन अ.स. हमें सिखाते हैं कि हक़ के लिए आवाज़ उठाना फर्ज़ है। हमें नमाज़ क़ायम करनी है, सबील और तबर्रुक तकसीम करना है, ग़रीबों, यतीमों और लाचारों की मदद करनी है।
आज ज़रूरत है कि हम इस पैग़ाम को अपने जीवन में उतारें – ज़ालिम से डरें नहीं, बल्कि हक़ और इंसाफ़ के लिए आवाज़ बुलंद करें।

फतेहपुर सीकरी हजरत शैख़ सलीम चिश्ती दरगाह के सज़्ज़ादा नशीन अरशद फरीदी ने कहा कि – रसूलअल्लाह के घराने पर यज़ीद ने जो ज़ुल्म ढाए, वो इतने दर्दनाक हैं कि उन्हें बयान करना मुमकिन नहीं। कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन अ.स. और उनके परिवार ने जो कुर्बानी दी, वो सिर्फ इस्लाम के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत के लिए थी।
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